जिला :- महासमुंद
विषय :- फागुन
विधा :- दोहा छंद
शीर्षक :- जोगी के दोहे "फागुन मास"
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ग्रीष्म शरद के मेल का, अनुपम फागुन मास।
ऋतु बसंत के रूप में, है यह सबसे खास।।१।।
बाल युवा गुरु कृष्ण का, पूजन करते लोग।
इनकी पूजा से बने, नित खुशियों के योग।।२।।
हिन्दू निज पंचांग में, माने अंतिम मास।
शनै - शनै गर्मी बढ़े, बढ़े हृदय की प्यास।।३।।
प्रेम और आनंद से, हर्षित है संसार।
द्वेष - बैर को त्यागता, रंगों का त्यौहार।।४।।
गेहूं की बाली सखा, खेतों में लहराय।
देख सुनहरी बालियाँ, कृषक हृदय मुस्काय।।५।।
गली - गली में गूंजता, सखा नगाड़ा ढ़ोल।
पिचकारी मारें सभी, प्रीत भाव को घोल।।६।।
विरहन की पीड़ा जगी, पिया गए परदेश।
आएंगे इस मास में, सोच सजाए केश।।७।।
शहनाई बजने लगी, होने लगे विवाह।
नव्य युवाओं में जगी, प्रणय मिलन की चाह।।८।।
कृष्ण पक्ष चौदस सखा, शिव शंकर की रात।
उनके पूजन से मिले, खुशियों की सौगात।।९।।
पेड़ों में फलने लगे, खट्टे - मीठे आम।
बड़ी रंगीली होत है, फागुन की ये शाम।।१०।।
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