जिला :- महासमुंद
विषय :- चार - चिरौंजी
विधा :- दोहा छंद
शीर्षक :- चिरौंजी के लाभ
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चार - चिरौंजी फल गए, वृक्ष हुए फलदार।
काले मोती से लगे, सजे गले ज्यों हार।।१।।
भले जरा मँहगे मगर, बड़े अनोखे लाभ।
कच्चे पक्के झूलते, डाली में हरिताभ।।२।।
बड़े लाभकारी सुनो, जड़ - फल - पत्ती - बीज।
चाह लिए जो गोंद की, जाए मनुज पसीज।।३।।
सूखे मेवे के लिए, फल को लेते फोड़।
केवल कुछ की चाह में, तोड़े कई करोड़।।४।।
तन में गर सूजन हुआ, लगा चार का अर्क।
पल भर में आराम हो, दिए वैद्य ने तर्क।।५।।
बीज चिरौंजी पर किया, जाने कितने शोध।
रोग मुक्त काया रखे, बढ़ती है प्रतिरोध।।६।।
डायरिया गर हो कभी, संग शहद लें छाल।
भोग लगा उसकी मिले, राहत हमे कमाल।।७।।
कब्ज रोग में तुम सखा, करो चिरौंजी भोग।
सेहत क्षण में चुस्त हो, काया रहे निरोग।।८।।
मनुज त्वचा में नित लगा, चार - दूध का लेप।
मुख से सब धब्बे मिटे, राय सुनो संक्षेप।।९।।
तेल चिरौंजी का बना, लगे मनुज के केश।
झड़े नहीं न श्वेत हों, जैसे हो परिवेश।।१०।।
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