Saturday, May 29, 2021

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- क्या होगा जी हाल

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- मुक्त
शीर्षक :- क्या होगा जी हाल।
विधा :- दोहा गीत

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उठे हृदय में नित्य ही, केवल एक सवाल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

बरसों तक घर में रहे, लगा बुद्धि में जंग।
दूर पढ़ाई से हुए, मचा रहे हुड़दंग।।
देखो जकड़ रही हमे, यंत्रों का यह जाल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

विद्यालय जाते सदा, पढ़ते थे नव पाठ।
पूरी कक्षा में सुनो, होती थी निज ठाठ।।
घर बैठे शिक्षा हुई, देखो अब बेहाल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

कोरा कागज हो गए, बचा नहीं कुछ शेष।
बदल गया है आचरण, बदल गया है भेष।।
जिज्ञासा अब मर गई, ज्ञान लगे जंजाल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

कोरोना के दौर का, लगा हमें आघात।
भूल गए हैं ज्ञान सब, करनी नव शुरुआत।।
फिर से नव आगाज में, धीमी होगी चाल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

जाने कैसे यह कटे, रोग व्याधि के काल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

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