Wednesday, May 26, 2021

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- दिवास्वप्न

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- दिवास्वप्न
शीर्षक :- दिवास्वप्न
विधा :- कविता ( छंद मुक्त )

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बैठा है खेत की मेड़ पर,
एक नन्हा सा बालक नादान।
सामने गायों का झुंड है,
नीचे घास, ऊपर खुला आसमान।

मन में उसके चलचित्र की भांति,
दिख रहा है दृश्य सुहाना।
दिवास्वप्न में खोया बालक,
चाहता है खूब कमाना।

देखता है दृश्य अद्भुत,
दूध बेच पैसे कमाता।
खुला है गोठान नव्य,
गोबर वहाँ बेच आता।

जो भी मिलते पैसे उनसे,
ले लेता गायों का जोड़ा।
फिर पैसे जो और मिले तो,
ले आता एक अद्भुत घोड़ा।

इसी तरह आगे बढ़ते वह,
बन जाता नामी धनवान।
नौकर-चाकर लेकर आते,
स्वाद भरे मीठे पकवान।

तभी अचानक सपना टूटा,
वर्तमान में आया नादान।
गायब हो गए नौकर-चाकर,
खो गए कहीं सारे पकवान।

खेत में ही बैठा था वह,
नहीं हुआ था वह धनवान।
टूट गया वह दिवास्वप्न अरु,
टूट गए सारे अरमान।

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