जिला :- महासमुंद
विषय :- मानसून
शीर्षक :- जोगी के दोहे "मानसून"
विधा :- कविता
प्रायोगिक छंद :- दोहा छंद
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मानसून का आगमन, लिए नव्य सौगात।
हरी-भरी होगी धरा, जब होगी बरसात।।१।।
सागर से मिलने चले, है नदियों में होड़।
अविरल वे बहने लगी, अनुपम देखो दौड़।।२।।
मेंढ़क टर्राते फिरे, भरे लबालब ताल।
सर्प मीन कछुए सखा, करने लगे धमाल।।३।।
घुमड़-घुमड़ कर घिर रही, देखो घट घनघोर।
पंख पसारे नाचते, वन में पुलकित मोर।।४।।
खेत जोतकर पालता, हिय में नव अरमान।
पहली बारिश देख कर, हर्षित हुआ किसान।।५।।
जब बारिश होगी सखा, घटे धरा की ताप।
शीतल पुरवाई चले, धुले हृदय के पाप।।६।।
झंकृत उर के कोर हैं, मिटे सकल अवसाद।
खुश होकर छतरी कहे, मुझे करेंगें याद।।७।।
कागज की कश्ती बना, खेलें अद्भुत खेल।
बहती जल धारा सखा, दे खुशियाँ बेमेल।।८।।
सकल जगत में चढ़ गया, मानसून का रंग।
गर्जन-तर्जन से घटा, मचा रहे हुड़दंग।।९।।
मानसून को देखकर, जोगी करे पुकार।
हे बादल! बरसो यहाँ, सूख रहा संसार।।१०।।
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