सुभाष नगर दुर्ग
शीर्षक-आँखों में छायी हैं
आँखो में छायी हैं,उनकी ये सूरत,
दिल में बैंठे हैं,जी उनकी मूर्ति
कैसे भुलाऊं मैं कैसे भुलाउँ।।
रात सुहानी मैं बन गयी दीवानी
रातरानी बनकर,मैं खुशबू बिखराऊँ।
जिंदगी सूरज सा ,ढलता जायें
उम्र की दहलीज, भी बढ़ता जायें
मैं सदाबहार फुल बन जाऊँ।।
याद आती है,वह बेला,न कोई झमेला
कैंसे भुलाऊं मैं, कैसे भुलाऊं।।
काट रही हूं मैं जिंदगी के पल
नैंन मिलते थे,हर क्षण हर पल
अब न आतें मेरे,प्रितयतम
बहार बनकर, पतझड़ बनकर
नैंन तरसती है,जलधारा बनकर
कैसे भुलाऊं मैं, कैसे भुलाऊं।।
आँखे मेरे दिल के दो सितारे
मेरे जीवन के पथ में करते सहारे
प्यार, तड़प,मिलन, सब कुछ जानती हैं आँखे।
कैसे भुलाऊं मैं कैसे भुलाऊं।।
सीमा
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