01.कवयित्री - सीमा साहू
02-राज्य-छत्तीसगढ़
03-शीर्षक-आंँखो में पावस सी
04-मोबाइल नंबर-
नारी जिंदगी !
आंँखों में पावस सी,
लगने लगी नारी जिंदगी।
पूर्णिमा में अमावस सी,
लगने लगी नारी जिंदगी।।
कभी धूप कभी छांँव,
कभी आंँधी तूफान रुपी
मन के गगन में घन सी,
लगने लगी नारी जिंदगी।
परिवार के दो पाटों के बीच
संकट के कांँटों के बीच,
जीवन उपवन में सुमन सी,
महकने लगी नारी जिंदगी।
श्याम मेघ की गर्जना
बिजली वर्षा की सर्जना
आषाढ़ के अभिनंदन में
मयूर मन सी,
मचलने लगी नारी जिंदगी।
रिमझिम बरसे नयनों में सावन
पीड़ा का पावस तड़पाये मन
प्रिय के लिए विरहन सी,
तड़पने लगी नारी जिंदगी।
भीग लो बरस रही
जिंदगी की बूंदें
मिल लो जाने कब
चले जाये मोक्ष में,
जीवन दर्शन में चिंतन सी
उतरने लगी नारी जिंदगी।
ढोंगी कुछ जोगी
लगते वासना के रोगी
उम्र में क्या बेटी क्या पोती
शोषण में बिलखती रोती
जीवन में चीरहरण सी,
ठगी ठगी सी लगती
नारी जिंदगी।।
✍️सीमा साहू
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