शीर्षक-काकी
राज्य-छत्तीसगढ़
काकी -
गांव में मैं काकी को बड़ी फुर्ती से काम करती देखती थी।पनघट से पानी भरती हुई,सकरी गली से गुजरती हुई,आंचल से सर ढककर,सगरी काकी चहकती रहती थी। सखियों के साथ गगरी में पानी ले जाती हुई, गगरी की सुंदर नक्काशी बहुत सुंदर ,कलाई में सुंदर लाल रंग की चुडियां, खनकती पायल की छम-छम से आंगन में सर सर झाड़ू के साथ काकी की सुरली आवाज कर्णप्रिय लगते थे, कभी दिवाल पर पीला रंग की छुही से दिवाल की लिपाई-पोताई करती थी, सुंदर कसीदाकारी जैसे दिखती थी!
मानो स्केल से सुंदर नाप करके रेखा बना ली हों , लगता था गणित की शिक्षिका हों..कभी सुंदर गोल गोल परसा की मोटा रोटी बनाती,घी के साथ ,टमाटर की चटनी की खुशबू से घर महक उठती थी,रसोई घर में प्यार का रस घोल देती थी ।
बैल का जोड़ा ,हल अपने कंधे में रखकर चलती अपने खेत की ओर बैल की जोड़ी शेरु-वीरु को तुतारी से हों---हों....तो --तो की आवाज जंगल में गुंज उठता था,वह हल से खेत की जुताई करती थी।धान बुआई,गोबर खाद-पानी से लेकर धान कटाई,कर्मा ददरिया के गीत गाती, कटाई के बाद भारा बांधकर बैलगाड़ी में भरकर सखियों के साथ खलिहान तक लाती थी।
बैलगाड़ी में बैठकर रात में किसान भाइयों के साथ मिलकर मिजाई करती, कोचिया के पास धान बेचकर रूपया को ग्रामीण बैंक में जमा करती थी।
मेरे साथ कभी तपती धूप में भी ,तालाब के किनारे आम के पेड़ में चढ़कर अकोशी से आम तोड़ती थीं और कहती थी ----
छोटी मालकिन! आप के हाथ के अथान का अचार अच्छा लगता हैं। मुझे देना मैं बासी के साथ खाऊंगी, मैं उसे आम का अचार देती ,तब काकी बहुत खुश हो जाती थी।
मैं एक दिन काकी से बोली-बस काकी ! आप सभी में सर्वगुण संपन्न हो ,बस थोड़ी सी कुछ कमी हैं ?
वह हैं शिक्षा की कमी!
लें स्वीकार करते हुए तपाक से बोली...... हां छोटी मालकिन!
"काला अक्षर भैंस बराबर'' -----कहते हुए बहुत दुखी हो गई।
मैंने कहा_चिंता मत कर काकी मैं आपको पढ़ाऊंगी-रात में सब काम निपटा के ९बजे आना, काकी और सभी सखियां पढ़ना सीख गई, और सभी एक-दूसरे को पढ़ाने लगी , सभी बहनें साक्षर हो गए थे ....
वक्त ने करवट बदली , मां पापा जी , गुरु जी, परिवार समाज के आशीर्वाद से मेरा विवाह दुर्ग में हो गयी... अपने परिवार का दायित्व निभाते- निभाते बीस वर्ष हो गए, बहुत दिनों के बाद मैके जाना हुआ,मन हुआ काकी से मिलने का उनके घर गई , वहां सब कुछ बदल सा गया था ,उनका स्वर्ग सा घर चार दीवारों में बट चुका था।
मैं आवाज लगाई -"सगरी काकी-सगरी काकी---!"मेरी सगरी काकी बुढ़ी हों गयी थी,कमर झुकी हुई,बाल पक गए थे,वह लाठी टेकती हुई बहार निकली---
आंखें धुंधली, मेरी आवाज़ को परखने की कोशिश कर रही थी।
मैंने कहा-"काकी! मैं आपकी छोटी मालकिन "
वह मुझे पहचान गई, मेरे बाहों में लिपट गई-ओह मेरी.....नोनीं ।
मैंने बातचीत की शुरुआत की
और "काकी! आप अपने घर में संतृष्ट हैं?
काकी बोली _" नोनी पहले मैं संतृष्ट थी लेकिन अब नहीं!
मैंने कहा क्यों काकी?
" जब मेरे चारों बेटे मेरे ऊपर निर्भर थे तब मैं संतृष्ट थी।अब मैं उनपर आश्रित हूं। मैंने बच्चों को पढ़ा लिखाकर बड़ा किया, सभी नौकरी में हैं,घर में सब कुछ हैं, लेकिन प्यार नहीं,सब कुछ रेस्टोरेंट हो गया है, कौन आता कौन जाता है, मुझे कुछ समझ नहीं आता हैं,बहुए समाजसेवीका है, दुसरी नारी निकेतन की अध्यक्ष, तीसरी वृद्धाश्रम की संचालिका, चौथी हृयूमन राइट्स की सक्रिय कार्यकर्ता सब अपने में मस्त 'दिया तले अंधेरा है' छोटी मालकिन.....!
कभी खाने को मिलता है, कभी भूखे रहना पड़ता हैं, परिवार में सभी बेटे मेरे पालन-पोषण के लिए महिना बंधवा लिए हैं ,हर महीने एक-एक बेटा के घर जाती हूं, कुछ कह नहीं पाती हूं , मेरी गठरी इस घर से उस घर, सुबह दवाई पानी खिलाते हैं,टेबल में पानी रख के चले जाते हैं, प्यास लगती है तो पानी पीने के लिए ,जब हाथ बढ़ाती हूं, पानी भी कपकपी हाथ से छूट जाता हैं,नाती पोते को आवाज लगाती हूं, आज कल के बच्चे भी मोबाइल में व्यस्त हो जाते हैं, कुछ सुन नहीं पाते हैं, मैं प्यासे ही रह जाती हूं।
बस रोती हूं , कोई सुनने वाला नहीं -नोनी!
बस जीवन का क्रम चलता हैं,
मैं अपने आप को कोसती हूं कि
हे भगवान! आप ने "मेरी कया दशा कर दी है। जिसके चार पुत्र हो उसको दो वक्त की रोटी नसीब नहीं।"
कहती हुई काकी पुनः फफकर रो पड़ी।
मैं अपने आचल से उनकें आंसू पोछते हुई बोली-मत रो काकी!
भगवान के घर देर हैं,अंधेर नहीं मैं समझ गई , सचमुच एक मां अपने चार बेटे को पाल सकती हैं, लेकिन चार बेटे एक मां को नहीं पाल सकता।
अंततः भाव विभोर होकर मैं भी रो पड़ी ।
सीमा साहू सुभाष नगर दुर्ग
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