Friday, June 11, 2021

हम कविता क्यों लिखते हैं? : नलिनी बाजपेयी

रचनाकार -नलिनी बाजपेयी
 संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ.ग.)
विषय-हम कविता क्यों लिखते है?
      दिनाँक-11.06.21

    *हम कविता क्यों लिखते है*
   
               साहित्यिक विधाओं के अंतर्गत कविता भी एक प्रमुख विधा है। कविता " *गागर में सागर भरने*" में सक्षम होता है। कवि की आत्मा की क्षुधा कविता लिखकर तृप्त होती है। कवि कविता के माध्यम से जनमानस में ऊर्जा का संचार करता है,अपने विचारों को ज्यादा प्रभावशाली बनाने के लिए कविता लिखता है।सामाजिक चेतना जगाने, *सर्वजन सुखायः,*सर्वजन हितायः* की भावना को समेटे कालजयी सृजन को प्रभावशाली बनाने के लिए कविता लिखता है।

        " *कविता में जब भावों की अनुभूति होती है। मन के विचार जब उद्वेलित होने लगते हैं, तब कवि की लेखनी कागज के पृष्ठों पर चल पड़ती है*"। कवि जब  प्रकृति में जब सौंदर्य की अनुभूति  करता है। स्वयं या जगत की व्यथा को महसूस करता है। कवि जब भावों, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को लिपिबद्ध करना चाहता है, तब वह कविता लिखते को आतुर हो उठता हैं।
            कवि की कल्पनाशीलता, कवि के जन हितकारी उद्देश्य और  उसके चारों जो हर्ष, विषाद,भय,प्रीति,संयोग, वियोग ,शौर्य,करूणा,हास्य, आदि भावों को देखकर उसके मन में भाव प्रस्फुटित होते है।उन भावों में स्वंय की पीड़ा या हर्ष महसूस करता है।उसके विचारों को व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जाने वाली  सर्वव्यापकता की दृष्टि मिल जाती है,और विचारों को जब शब्द मिलते हैं। तब कवि मन  कुछ लिखने को तैयार हो जाता है।
              कवि प्रकृति के बहुत करीब होते हैं। उनका संवेदनशील मन जब भावों को अभिव्यक्ति प्रदान कर नए मूल्य,नए शिल्प विधान ,नये बिंब और बोलने लिखने की अतिशय क्षमता महसूस करने लगता है, तब कविता कामिनी कामिनी उसके हृदय से निकलकर लिपिबद्ध हो जाती है और हम कविता लिखने लग जाते हैं।

"*हिय में जब 
         हलचल मची।
  भावों ने ली 
            अंगड़ाई।।

 स्वर्णाभा छा गई 
               मन गगन में।   
  तब कविता कामनी 
               दौड़ी आई।।
 
जग का सौंदर्य देख
          फूलों की सुरभि से,
 धरा का अनुपम 
        सौंदर्य नजर है आई। 

अंबर धरती जल 
     थल में इंद्रधनुषी रंग है छाई।।
 कमनीय डाल सी 
        कविता मन  में इतराई।।

मन के सुख-दुख
             जैसे भावों को,   
  असीमित जन्मे 
                उद्गारों  को।

  मूर्त रूप देने को
             कविता बन
 ह्रदय में आकुल
            हो छटपटाई।।"
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         नलिनी बाजपेयी
     संबलपुर,कांकेर, (छ. ग.)

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