Thursday, June 3, 2021

नलिनी बाजपेयी कृत रेखाचित्र- अंधविश्वास

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
 संबलपुर,जिला-कांकेर, (छ .ग.)
         विषय-अंध विश्वास
           विधा -रेखाचित्र
        दिनाँक-03.06.21

               *अंध विश्वास*

            नैना की बड़ी बड़ी आँखें उसमें स्पष्ट दिखाई देते लाल- लाल डोरे आँसूओं से तर चेहरा,हल्दी की रंग लिए पीली साड़ी में उसका सौंदर्य निखर उठा था। दो दिन पहले ही उसके पति भगवान को प्यारे हो गए थे।    
           रो-रोकर नैना का बुरा हाल.... बुखार से तमतमाया चेहरा, तेज अंधड़ उठने पर जैसे पेड़ डोलने लगते वैसे ही रह-रहकर उसका बदन काँप उठता था।वह गिर-गिर पड़ती थी।शरीर में सिहरन सी उठती, जैसे शीत ऋतु में किसे बर्फीले क्षेत्र में वह बैठी हो।
            घर मेहमानों से भरा था। तरह- तरह के लोग, तरह-तरह की बातें...... कोई छाती पीटता, कोई उसके पति की प्रशंसा करता, कोई बेहोशी की मुद्रा में बिलखते नजर आ रहे थे ।कोई बोल -बोल कर रोते और अपना दुख व्यक्त करते थे ।सभी नैना के पति को अपने-अपने तरीके से श्रद्धांजलि दे रहे थे। 
              नैना पढ़ी-लिखी संभ्रांत घराने की बेटी थी। दुःख तो उसे भी अपार था ।उसकी तो दुनियाँ उजड़ चुकी थी....मगर उसके दुख प्रकट करने के  तरीके अलग थे। कोई कहता कैसी निर्दयी है...... पत्थर दिल वाली...... इसकी तो  आँखों का पानी भी सूख गया है। सब सुनती रही,उसके कानों में ये शब्द गर्म सीसे के समान लग रहे थे। वह दहाड़े  मारकर रो भी नहीं सकती थी। ना छाती पीट सकती थी। व्यथा की सागर की हिलोरे उसके दिल में भी उठ  रही थी।सारी दुनियाँ उसे बेजार नजर आ रही थी।
           तभी एक श्वेत परिधान धारे महिला चेहरा सपाट लिए उसे खींचकर ले जाते हुए कहने लगी- "नाई आया है।केश मुंडन कराकर नहलाना  है ।" वो रोती-बिलखती रही लेकिन उसका किसी ने नहीं सुना। डॉक्टर ने बिस्तर से उठने मना किया था ।एक सौ चार डिग्री बुखार से उसका शरीर काँप रहा था। दांत भी बज रहे थे ।मगर उफ! ये  कैसा रीति रिवाज ....ये कैसा अंधविश्वास को कस कर पकड़े पाँच- दस महिलाएं उसे घर के अंदर घसीटते ले गई और वैधव्य के कठोर और बेहूदे परंपराओं का निर्वहन करने लगी। नैना के दुर्गति करते रहे, और नैना निढ़ाल होकर जमीन में गिर पड़ी और सन्नपात से उसके प्राण पखेरू उड़ गए।

            नलिनी बाजपेयी
          संबलपुर, कांकेर, (छ .ग.)

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