संबलपुर,जिला -कांकेर, (छ. ग.)
विषय-परामर्श,विधा-लघुकथा
दिनाँक-02.06.21
*परामर्श*
सुशीला बीते दिनों को याद कर रही थी ।आज से दस वर्ष पहले इस घर में ब्याह कर आई थी।ससुराल में संयुक्त परिवार था।सुशीला अपने घर में अकेली थी ।किसी दूसरे को वह बर्दाश्त नहीं कर पाती थी। घर में रोज कलह होने लगी थी। सुशीला की माँ अपनी बेटी को लड़- झगड़ कर मायके ले आई थी।
कुछ दिन मायके में अच्छा लगा, मगर थोड़े दिनों बाद ही उसका मन भर गया। गाँव में दबी जुबान से चर्चा होने लगी थी कि-" पति को छोड़ कर बैठी है।"
उन्हीं दिनों पड़ोस की दादी माँ ने उसे *परामर्श* दिया और कहा -" *बेटी सुशीला यह घर तुम्हारा मायका का है। शादी के बाद लड़की को ससुराल में ही रहना शोभा देता है। दुःख मिले या सुख मिले ससुराल में ही तुम्हें रहना चाहिए ,और सेवा भाव से सबका मन जीतना चाहिए।*" दादी माँ की बात सुशीला के मन में बैठ गई ।दूसरे दिन सुशीला अकेले ही अपने ससुराल चली गई। सब लोगों ने उसे अपनापन दिया।अपने व्यवहार और सेवा से लोगों के मन में समा गई।
आज घर में उसका ही राजपाट चलता है। दो प्यारे- प्यारे बच्चे हो गए हैं। घर स्वर्ग बन गया है। सुशीला की हर कोई प्रशंसा करता है। आज सुशीला को दादी माँ की बात याद आ रही थी दादी माँ अब इस दुनियाँ में नहीं रही। मगर उसने जो *परामर्श* दिया उसके कारण ही सुशीला का घर पुनः बस गया। वह मन ही मन दादी माँ को धन्यवाद दे रही थी..........।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर, (छ .ग.)
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