संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ. ग.)
विषय-मोह,विधा-आलेख
दिनाँक-28.05 .21
*मोह*
मोह मन की वह भावना है जो वस्तु विशेष के प्रति व्यक्ति को हर पल उसे अपनी ओर आकर्षित करते रहता है। हर हाल व्यक्ति उस वस्तु को पाना चाहता है ,या अपने पास बने रहने देना चाहता है। वह हमारे मन को बार-बार चुंबक की भाँति अपनी ओर आकर्षित करता है ।
आदमी अच्छे से जानता है कि, माया मोह सब मानसिक विकार है ।मनुष्य के मन में सात्विक, राजस, और तामस मूल प्रकृति पाई जाती है। इस संसार में कुछ पदार्थ या चेतना रहित वस्तु और व्यक्तिगत सुख-दुख ही मोह का प्रमुख स्रोत हैं। ऐसे ही जड़ पदार्थ ही मोह का कारण बनता है। *व्यक्ति की अज्ञानता के कारण किसी वस्तु के प्रति लगाव की पराकाष्ठा ही मोह का प्रकट रूप है। नश्वर संसार,या नाशवान वस्तुओं के प्रति आसक्ति ही मोह कहलाता है।* किसी को धन दौलत अर्थात काया, किसी को माया के प्रति आसक्ति होती है वही मोह है।
अगर हमारे पास कोई वस्तु है और खो गई है तो हमें बहुत दुःख होता है, क्योंकि वह हम से जुड़ा होता है। इसी तारतम्य में यदि हमारी खोने वाली वस्तु से भी अधिक महंगी किसी और की वस्तु खो जाती है या नष्ट हो जाती है, तब हमें दुःख नहीं होता। हमारी छोटी चीज का नष्ट होना भी हमें कई दिनों तक परेशान किए रहता है, और किसी की जिंदगी भर की पूरी कमाई नष्ट होते देख कर भी हमें दुख नहीं होता ।कहने का तात्पर्य है कि, "मोह" अर्थात अज्ञानता या सम्मोहन होना, अर्थात स्वयं के साथ संबंध होना ही मोह कहलाता है। अपनी वस्तु के खोने का दुःख हमें बहुत होता है,और पराए का बड़ा नुकसान भी हमें दुःखी नहीं करता। अर्थात वस्तु से मोह नहीं बल्कि हमारे मन के अंदर यह भाव होता है,अर्थात *जहाँ " *मैं, मेरा* " *है वहीं मोह होगा। *मोह में जब व्यवधान होता है तो व्यक्ति को क्रोध होता है, लोभ होता है, और अहंकार भी होता है, और यही पतन का कारण बनता है।*
कहने का तात्पर्य है मोह बुरी बात है।मोह से हमारा अपकर्ष होता हैं।पतन होता है।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर, (छ. ग.)
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