जिला- राजनांदगाँव(छ.ग.)
शीर्षक- पर्यावरण और जीवन!
विधा -कविता
चंद स्वार्थ के चक्कर में ,
हम भूल गए निज कर्म को !
प्रकृति में जहर घोल रहे हैं ,
हम भूल गए निज धर्म को !!
प्रकृति के अनुपम भेंट से ही ,
हरा -भरा जीवन रहता है !
सांसों की अमुल्य खजाना,
पर्यावरण से नित्य बढ़ता है !
जल, थल ,अग्नि,वायु, नभ
सभी दूषित हो रही हैं देखें !
इन्हीं तत्वों से देह बना है ,
इनको भी हम समझें !!
रोज हमने पेड़ों को काटा,
जिससे मिट्टी कट रही!
कारखानों की दूषित धुँआ से ,
रोज ऑक्सीजन घट रही!
लाखों टन कचरे और रंजक ,
नदियों में हम बहाते हैं !
पिने की पानी दूषित कर हम,
पारिस्थितिक तंत्र गड़बड़ाते है !
जब कम करेंगे विलासिता को ,
तब प्रकृति बच पायेगी !
जब अभाव में जीना सीखेंगे ,
तब खुशहाली आयेगी !!
व्याख्या - प्रस्तुत कविता में हमारे द्वारा पर्यावरण के लगातार किये जा रहे दोहन की बातें कहीं गयी है! हम जानते हैं कि पर्यावरण की अनुपम भेंट ऑक्सीजन से ही हमारी जीवन की सांसें चलती है ! जल, थल, अग्नि, वायु, नभ से हमारा शरीर बना है! अगर इसको हम हानि पहुचायेंगे तो खुद का नुकसान है! क्योंकि इससे पारिस्थितिक तंत्र बिगड़ रहा हैं, जो संपुर्ण जीव के लिए हानिकारक है!
अंत में अभाव में जीने की आदत हमें अपनाने की बात पर जोर दिया गया है! जिससे पर्यावरण को नुकसान होने से बचाया जा सकता है , और प्रकृति हरा -भरा हो जायेगी तथा जीवन में खुशहाली आ जायेगी!
दूजराम साहू
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