पता- भरदाकला (खैरागढ़)
जिला- राजनांदगाँव(छ.ग.)
विधा - भजन!
शिर्षक -"क्या रखा है इस जीवन में "
क्या रखा है इस जीवन में , थोड़ा तो विचार कर !
दिन-रात क्यों दौड़ा करता, थोड़ा सा आराम कर !!
कमा - कमा कर भरा खजाना , अंत काम न आएगा !
कुटुबं परिवार बंधु सखा , साथ कोई न जाएगा !!
हीरे मोती रह जाएंगे, देखना जड़ें के जड़ें यहाँ!
कोठी बंगला छूट जाएगी , देखना खड़े के खड़े यहाँ !!
जीस तन का गुमान किया तु,चोवा चंदन लगाए!
अंत समय तेरे साथ न जाये, हंस अकेला जाए !!
छड़ भंगुर जीवन हे पगले, पल भर में मिट जायेगा!
चलती के नाम गाड़ी है रे, थोड़े में रूक जायेगा !!
व्याख्या --
प्रस्तुत भजन में जीवन की छड़ भंगुरता की बात कही गई है! इंसान पूरे जीवन को धन -दौलत, माल -खजाना, परिवार आदि को जोड़ने में लगा देता है ! पर जब इस जीवन का अंत होता है तो कुछ साथ नहीं जाता, सब यही रह जाता है! और यहाँ तक जिस शरीर को सजा संवार कर रखते हैं पूरे जीवन भर वो भी साथ नहीं जाता है! जैसे गाड़ी में बैठा सवारी चलती गाड़ी में तब तक बैठ रहता है जब तक गाड़ी चलती रहती है पर जिस जगह गाड़ी खराब हो जाती है उसे वही छोड़कर मुसाफ़िर दूसरी गाड़ी में सवार होकर आगे चला जाता है! ठीक ऐसा ही शरीर जब तक ठीक रहता है तब तक जीवात्मा यहाँ वाश करता है, पर जैसे ही जीर्ण हो जाता है तो वह इसे छोड़ देता है!
इसलिए इंसान को ज्यादा -धनदौत, माल -खजाना, परिवार के पिछे नहीं भागना चाहिए! समय निकाल कर थोड़ा आराम करे और आत्म- चिंतन करना चाहिए !
दूजराम साहू
बहुत सुंदर सर जी
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ReplyDeleteबहुत सुंदर दूज भाई
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