जिला- राजनांदगाँव
विधा -कविता
शीर्षक- दीवार के घला कान होथे!
समझ नई आए मनखे
कईसे अब भयरा होगे हे !
सियान मन कहीथे कि
दीवार के घला कान होथे !!
लखटा म बईठे आदमी
घेरी भेरी चिल्लात हे,
फेर का कहिबे नई सुनत हे ,
तभो ले काकर संग गिजगीजात हे !
समझ नई आए कईसे अनजान होगे !!
फोन के तार घुसारे हे कान म
कहीं गोठियाले नई धरे धियान म ,
अकेल्ला बईठे बईठे पगला हो जथे
चिल्ला चिल्ला के मनखे खुद बईहा गेहे!
तीर म आदमी दुरहीयाके बिरान होगे !!
दूजराम साहू
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