स्थान --नवापारा खुर्द /सक्ति
जिला --जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा ---आलेख /कविता/ग़ज़ल
विषय ---इत्र
शीर्षक ---जीवन जिनका इत्र
जीवन जिनका इत्र है,पूजता उन्हें संसार ।
अगर नहीं है तो बनालो,उसकी है दरकार ।
इत्र एक महकने वाली ।
जो तन को महकाती है ।
कुछ पल ही यह रहती ।
फिर शांत हो जाती है ।
तन को महकाने से ।
न ज्ञान मिलता न पेट भरता ।
अजीब है मानव लेकिन ।
इत्र का उपयोग जरुर करता ।
उसको मालूम है इत्र से ।
कुछ हुआ है न होगा ।
फिर भी खाये जा रहा ।
धोखा ,धोखा ,धोखा ।
जितना धोखा खायेगा।
उसकी कोई सीमा नहीं ।
इत्र लगाने वालों की ।
कही कोई प्रतिमा नहीं ।
विलासिता की यह वस्तु ।
निर्धन के लिए दुर्लभ ।
जीवन में एकाद बार ही ।
ऐसा होता सुलभ ।
मैं तो हर लोगों से कहूंगा ।
इत्र के बजाय धूल बनो ।
किसी के पैर में सनो ।
इसके लिए गुणी सज्जन चुनो ।
पैर से सने रहोगे ।
धूप छाया जल मिलेगा ।
आने वाला जीवन उज्जवल मिलेगा ।
हो जायेगी नइया पार ।
इत्र वस्त्र महका सकता है ।
मन को बहका सकता है ।
शक्ति दिला नहीं सक्ती ।
भक्ति दिला नहीं सकती ।
लोग लगाए खूब लगाएं ।
कुछ न कुछ तो लगाना होगा ।
इत्र की दो बूंद से ।
कभी न जमाना होगा ।
मेरा मित्र इत्र लगाता है ।
मेरे पास बन ठनकर आता है ।
और मुझको भी समझाता है ।
हरदम इसका गीत गाता है ।
विवाद उससे मैं करता नहीं ।
क्यों कि वह मित्र हैं ।
उसे अहम हो गया है ।
उसके पास इत्र है ।
इत्र का इस युग में ।
प्रशंसा तो नहीं करुंगा ।
उपयोग करने वाले करते रहे ।
उनका दीवार नहीं बनूंगा ।
इत्र के अध्याय का प्रथम पाठ था ।
इसमें पाठ ही पाठ था ।
मैंने पाठ पढ़ लिया ।
और इति श्री भी कर लिया ।
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