स्थान ---नवापारा खुर्द/ सक्ती
जिला--- जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा---कविता /आलेख/ ग़ज़ल
विषय---- दिवास्वप्न
देख रहा निज को,मन के दरपन में ।
दिख रहा कैसे बचपन, कैसे यवन में ।
उसे भूलाना कैसे होगा
हम चाहेंगे जैसे होगा ।
और दूसरा क्यों चाहेंगे ।
जरुरी नहीं वैसे होगा ।
बदल जाता है मन ,मिलन और बिछड़न में ।
कुछ बदले कुछ बदला नहीं ।
आज नहीं तो अगला नहीं ।
भविष्य की क्या आशाएं ।
यह कदम पहला नहीं ।
हेर फेर करते नहीं,हम अपने वचन में ।
दर्पण अगर टूट जाए ।
उसके जगह नया आए ।
कुछ तो नया चेहरा मिलेगा ।
नया चेहरा मन को भाए ।
होते रहते परिवर्तन, सबके ही जीवन में ।
पुराने दर्पण पास नहीं ।
नये की बात दूर ।
सौ वर्ष हो गए चेहरा देखे ।
सोचे मन कब देखूं भरपूर ।
होते रहता हर पल, चित और चिंतन में ।
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