स्थान ----नवापारा खुर्द/ सक्ति
जिला ----जांजगीर-चांपा /छत्तीसगढ़
विधा---आलेख /कविता /ग़ज़ल
विषय ---चेतिका
शीर्षक--चेतिका से भय नहीं
जीने वाला चेतिका देखकर सहम जाता है ।
मरने वाला चेतिका देखकर खुशी मनाता है ।
हमें मालूम है एक दिन हमें है जाना ।
दुनियां की बनाई बातों से क्या घबराना ।
जाएंगे फिर आएंगे यही तो नाता है ।
लोग चेतिका बना नष्ट करते तन को ।
अंतिम बिदाई देते जाने वाले जीवन को ।
मैं फिर आऊंगा धरा पर कह वह जाता है ।
जीवन जिसका जितना उतना जीया कहते ।
जब तक जीवन है इस धरा पर लोग रहते ।
उसकी मर्जी यहां चले वही लाता ले जाता है ।
चेतिका संसार का सत्य जिसमें सबको लेटना है ।
सबका देख सकते हम खुद का नहीं देखना है ।
यही पर धन धर्म कर्म सब कुछ छूट जाता है ।
यह समय होता है सिर्फ सिर्फ पछतावे का ।
कोई कुछ नहीं कर सकता उसके दावे का ।
चेतिका से क्या भयभीत होना वह हमें लाता है ।
मांगने से चेतिका किसी ने धरा पर पाया नहीं ।
चेतिका को मन में किसी ने कभी बसाया नहीं ।
एक निश्चित समय में वह अपना रंग जमाता है ।
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