निवास-बायरन बाजार,रायपुर ।
जिला- रायपुर,छत्तीसगढ ।
विषय-" इत्र "
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक- " इत्र " ।
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•••••••♡♡|| इत्र ||♡♡•••••••••
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मैं महज़ इत्र नहीं---
हूँ मुगलों की,महफ़िलों की शान,
मेरी खुशबू ,करती सबको मदमस्त,
डूब जाते, उस पल, सारे लोग --।
मेरी खुशबू ,करे ना,किसी से भेद ---
मैं सारे वातायन में,फैलने का,
मिल के,हवा के साथ,हुनर रखती हूँ ।
मेरी एक,छोटी सी बूँद---
ही काफी है,तुमको और--
वातावरण को महकाने के लिए ।
गुलाब,केवड़ा और मोंगरा--
फूलों की,ये पंखुड़ियां, जब--
सड़ती-गलती व रुप है बदलती,
तब बन जाती है,इत्र महरानी ।
मैं सोचता हूँ कि--
मानवता इत्र बन जाये,
सारे जहान में,ऐसी खुशबू फैलायें,
सुख-शांति और समरसता लायें ।
मैं हूँ,एक मामूली सी इत्र--
मुझमें तनिक भी,गरूर नहीं,
मैं,नर-नारी सबमें मिल जाऊँ,
अपने-पराये की,दूरियाँ मिटाऊँ ।
ईद-मिलन में,मोमिनो के--
परिधानों में,खुशबू फैलाती,
वे,एक-दूसरे से,जब गले हैं मिलते,
दो दिलों में भी,मोहब्बतें घोलते --।
सियासतदानों व रहिसजादे--
होते मेरे,बहुत शौक़ीन,
सजती हूँ मैं,खूबसूरत बोतलों में,
जब मिलती,मैं रुई के फाहे से,
जब वे कानों में, हैं फँसाते ,
तो,ये इनकी ,रूहें को भी महकाते ।
इत्र की, खुशबू की तरह--
सबके दिलों में घुलना,
अपना मोल ,तुम दिखाना,
सारे जहान में,तुम बिकोगे,
गीत-गजलों में,तुम सजोगे --।
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