रचनाकार-एच-एस-अरमो, अरमान ।
निवास-बायरन बाजार,रायपुर ।
जिला-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
विषय-" बसाहट " ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक- "" बसाहट "" ।
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■¤■¤••||बसाहट ||••¤■¤■
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आदिम युग से शुरू हुई---
बसाहट की कहानी,
रहते थे कभी कबीले में,
फिर हुई ,गाँवों की बसाहट--।
राज्य बने और रियासतें भी बनीं ---
फिर शुरु हुई वहाँ बसाहट,
किले बने , परकोट भी बने ,
फिर बना ,वह प्रजा,सेना का रहवास।
गाँवों से,कस्बे व शहर बने -----
जीवन स्तर में,फिर आया बदलाव,
और लोग,सुविधा भोगी हुये ,
और फिर,बसाहट भी बदलते रहते ।
किसी निर्जन स्थानों में--
जब,पहले-पहल कोई है बसता,
फिर वहाँ,धीरे-धीरे लोग बसते जाते,
ऐसी बसाहट बनाती जाती हैं,
टोला,मौहल्ला और गांव,शहर--।
बड़े शहरों में,होती जा रही हैं---
अब घनी आबादी और--
बनने लगती,फिर महल व अटारियाँ,
और गरीबों की झुग्गी-झोपड़पट्टीयाँ,
हो जाती हैं,ऐसी बसाहट की,
परेशानियाँ बढ़ती ही जाती हैं--।
बसाहट मानव जीवन के लिए--
एक मूल आवश्यकता है बनी ,
इससे हमको ,सुरक्षा भी मिली,
और मानवीय विकास को,गति मिली।
जहाँ मिले,सभी को सुकून---
और जहाँ मिलता रहे आबो-दाना,
वहीं अक्सर,बसते जाते हैं,
जग के, जीव-जन्तु व इंसान सारे ।
घने जंगलों में---
बेफ़िक्र होती है जिन्दगी ,
वहाँ जंगली, जानवरों की,
बसाहट होती है,बहुत भारी,
मिले वहां पक्षियों का कलरव भारी ।
राज्य विस्तार,विरासत की भूख--
ने ही,आपस में युद्घ है कराया,
जिससे बसाहट का विनाश हुआ,
और सभ्यताओं की भारी क्षति हुई ।
बसाहट,गाँव,नगर,राज्य की--
सदा बनती है, मूल पहचान,
मिलते हैं,उन्हें एक नया नाम,
यही मानव सभ्यता की पहचान ।
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