रचनाकार-एच-एस-अरमो,अरमान ।
निवास-बायरन बाजार,रायपुर ।
जिला-रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
विषय- कानन ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक- """ कानन """""।
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¤¤¤¤¤|||••कानन••|||¤¤¤¤¤
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जगत में,कानन ना होते --
जिंदगी में,फिर आनन्द भी न होते।
भौगोलिक स्थिति के कारण--
धरा में,कानन कई प्रकार के होते,
पर,अफ्रीका के,कानन में,
अति सघन,ऊंचे-ऊंचे वृक्ष होते --।
कानन इस धरा में,ना होते--
मृदु जल,हम कहाँ से पाते,
वर्षा ऋतु का आनन्द हम,
व पानी की फुहारें,कहाँ पाते ।
कानन में,जंगली जीव-जन्तु होते---
विविध वनस्पतियों के साथ- साथ ,
जड़ी बूटियों के हैं,असीम भण्डार ,
ये सब,निभाते लाभदायी किरदार--।
वृक्षों की सघनता,पहाड़ों की ऊँचाईयाँ
बहते झरनों की,कल-कल ध्वनियाँ,
पक्षियों की,अजीब-सी ,आती आवाजें,
शेर की,कानन में,दहाड़ती तेज गर्जनें।
मानव ने,अपने स्वार्थ के लिए--
कानन को,बहुत बर्बाद किया है,
जंगली जानवरों के पर्यावास को,
हमनें ही,बेशक बिगाड़ दिया है--।
कानन में,वृक्षों की सघनता---
पुकार-पुकार के,हमसे कह रही है,
हम,साथ-साथ रहकर भी,
आपस मे,कभी नहीं,लड़ा करते हैं,
सिर्फ आपस में,स्वस्थ प्रतिस्पर्धा करते
किसी को,नीचा नहीं ,हम दिखाते।
आओ एक बार कानन की---
हम सब,सैर ही,कर आयें,
राष्ट्रीय पार्क ,अभ्यारण की,
वहाँ कुछ दिन,ठहरा भी करें,
पर्यावरणीय जीवंतता का,
सही अर्थ ,हम खुद समझ जायेंगे ।
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