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रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)
शीर्षक -- *"ये गरीबी है या बीमारी "*
विधा -- कविता( तुकांत )
अलंकार - (पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार)
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बढ़ती है तृष्णा पल-पल
भूख अगन में जल-जल ।
पग - पग पर है लाचारी
ये गरीबी है या बीमारी ।।
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गरीबी से लड़ - लड़
मरते देखो धड़ - धड़ ।
काल मार पडे़ तड़-तड़
जीतें जीवन मर - मर ।।
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थू -थू अमीर हैं करते
धूँ-धूँ शरीर हैं जलते ।
गम के घूँट - घूँट पीना
पडे़ तड़प-तड़प जीना ।।
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ऋण - ऋण में पडे़ जीना
क्षण -क्षण है कैसा जीना।
धक-धक करते हैं सीना
गम - गम को है पीना ।।
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कैसा तंग-तंग जीवन
मन बे रंग-रंग उपवन
स्वप्न - स्वप्न है जीवन
कलह-कलह है तनमन।।
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कदम-कदम पर छलते गये
पल-पल जीवन ढ़लते गये ।
चल-चल के दम घूट से गये
सांसे चल-चल रुक से गये।।
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वादे कर - कर सरकार लुटे
जन-जन का आक्रोश फुटे।
आस - आस में विश्वास टुटे।
अपनों का नित-नित हाथ छुटे।।
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कहते हैं घट-घट राम हैं
कण-कण में भगवान हैं।
हे जर्रे-जर्रे का वासी
हर-हर दुख अविनाशी ।।
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गम के दरिया में डूब-डूब
गये जान से बहुत खूब-खूब।
अनजान रहे सब जान-जान
गरीबों की व्यथा है मान-मान।।
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धन्य - धन्य करो भोले नाथ
हर - हर दुख कर दो सनाथ ।
दुखिया नवाए सब माथ-माथ
सर रख दे मेरे सदा हाथ-हाथ।।
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रचनाकार
प्रवीण कुमार ठाकुर
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व्याख्या :--
प्रस्तुत कविता मे गरीबों की वर्तमान स्थिति ,दीनहीन दशा का बडा़ ही मार्मिक चित्रण किया गया है ।
तथा सम्पूर्ण कविता को पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार से सुसज्जित एवं अलंकृत करते हुए गरीबों की वस्तुस्थिति को कविता में उकेरने का एक प्रयास किया गया है ।
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