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रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगांव, छत्तीसगढ़
विषय -- शिक्षा वर्तमान परिदृश्य में
विधा -- आलेख ।
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शिक्षा किसी भी देश के सर्वांगीण विकास में अपनी अहम भूमिका का निर्वहन करता है ।अर्थात जिस देश में शिक्षा का स्तर जितना अधिक ऊँचा होता है । वह देश निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर होता है ।
हमारा देश प्राचीन काल से ही शिक्षा के क्षेत्र में हमेशा से आगे रहा है ।प्राचीन काल में देश में गुरुकुल शिक्षा पद्धति थी । घर से बाहर रह कर आश्रमों में रह कर ज्ञान प्राप्त किया करते थे । अर्थात माता पिता अपने बच्चों को पूर्ण रूप से ऋषि मुनियों को सौप दिया करते थे ।
शिष्य भी पूरी तन्मयता से आश्रय के नीति नियमों का पालन करते हुए , गुरु के प्रति पूर्ण रूपेण समर्पित हुआ करते थे ।जिसके कारण प्राचीन काल में शिष्य बहुत आज्ञाकारी , अनुशासित और संकल्पवान हुआ करते थे ।
आश्रम में नियम बहुत कड़े होते थे । और शिष्यों को नियमों का कड़ाई से पालन करने के लिए बाध्य होना पड़ता था ।
इसमें बच्चे के पालकों को किसी प्रकार की आपत्ति नहीं होती थी । ज्ञान नैतिकता से परिपूर्ण थी ।
वे तो ये चाहते थे कि बच्चे आश्रम से सर्व गुण संम्पन्न हो निकले ।और ऐसा ही होता भी था ।
गुरु ऋषि मुनि ज्ञानी जन भी अपने कर्त्तव्यों का अक्षरशः पालन करते थे ।
परंतु वर्तमान परिदृश्य में में शिक्षा पद्धतियाँ बिल्कुल बदल गयी है । नैतिक शिक्षा के कहीं भी दर्शन नहीं होते हैं ।
शिक्षा विभाग में हो रहे निरंतर बदलाव ने विभाग की कलाई खोल दी है । शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे बदलाव ने शिक्षा की नींव हिला दी है । पूरी शासन व्यवस्था , शिक्षा विभाग कागजी घोड़ा दौडाने में लगे हुए हैं ।
शिक्षक को कोई हक नहीं कि वह बच्चे को कुछ बोल सके । शिक्षक को कोई हक नहीं कि वह बच्चे को कुछ बोल सके । शिक्षा विभाग में कमजोर और श्रेष्ट बच्चे में कोई भेद नहीं है ।
शिक्षा का अधिकार मानों अभिशाप बन गया है वरदान नहीं । बच्चे गुरुजनों को आँखें दिखाने लगे हैं । वे जानते है गुरु को हमें प्रताड़ित करने का कोई बच्चों का गुणवत्ता स्तर निरंतर घटता जा रहा है ।
इसलिए शिक्षा क्षेत्र में उत्तरोत्तर सुधार लाने हेतु शिक्षा पद्धतियों में बदलाव लाना चाहिए । शिक्षा में शिष्यों के सम्पूर्ण विकास हेतु , नैतिकता का समावेश होना चाहिये।
शिक्षा के क्षेत्र में व्यवसायिकता का , आत्मनिर्भरता और रोजगारपरक शिक्षा का समावेश होना चाहिये ।
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रचनाकार
प्रवीण कुमार ठाकुर
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