रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव (छ.ग.)
शीर्षक -- दीवारों के भी कान होते हैं
विधा -- कविता
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जब भी कोई किसी से , रहस्य की बातें करता है ,
तब श्रोता पहले तो ध्यान , से इधर उधर देखता है ।
फिर श्रोता ने वक्ता से, सतर्क करते ये कहता है ,
अरे यार जरा धीरे से कहो ,दीवारों के कान होते हैं।
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अरे फिर हमने कहा , दीवारों के कान होते हैं ?
क्या सचमुच कान होते हैं , क्या वे इंसान होते हैं ?
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जो ये कहते हैं कि , दीवारों के कान होते हैं ,
सख्शियत वो ही बडे़ महान होते हैं क्योंकि ।
ऐसे ही लोग बन कर दीवार ,दुसरे की बातें सुनते हैं ,
चापलुसी करते हैं , गैरों के घरों में दरार करते हैं ।
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सख्श ऐसे बडे़ कमाल करते हैं ,कान दीवारों की बता,
दीवारों यूँ ही इंसान ,बेवजह बदनाम किया करते हैं ।
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व्याख्या :--
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प्रस्तुत कविता में रचनाकार ने कविता
के माध्यम से मुहावरा --
"दीवारों के कान होते हैं"
के माध्यम से इस मुहावरे का प्रयोग करने वाले लोगों
पर व्यंग्यात्मक प्रहार करते हुए कहा है कि दीवारों के
कोई कान वान नहीं होते खाम खाँ ऐसे लोग दीवारों को बदनाम करते हैं ।
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रचनाकार
प्रवीण कुमार ठाकुर
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