Thursday, July 9, 2020

राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- जग

काव्य संसद
**********************************
ज़िला    -- राजनांदगांव ,छत्तीसगढ़
विषय  -- *यह जग माया नगरी*
विधा     -- कविता ( निर्वेद रस )
**********************************
यह जग है  एक  माया नगरी 
टूट जाये कब  ये  मिट्टी गगरी
मोह माया सब  जग है ठगरी
छोड़ जाएगा धन  की  गठरी।

आया जग में मानव एक दिन 
तय है एक दिन तुमको जाना
माटी से उपजे माटी के काया
एक  दिन  माटी  में  है  जाना।

मतलब के सब है  रिश्ते  नाते
वक्त में काम  कोई  नहीं आते
यहीं रह  जाएंगे  दुनियाँ  सारी
धन  दौलत  ये  महल  अटारी।

निःस्वार्थ कोई  करो तुम काज
यही   है  परम  सुख  का  राज
जीवन मरण  तुम  सहज  बना
भज राम ईश मन मन्दिर बना।

जन  सेवा  ही प्रभु की है सेवा
परोपकार से ही मिलते हैं मेवा
जन सेवा कर नित्य आठोयाम
प्रभु प्रसन्न होंगे कर ऐसा काम।
**********************************
व्याख्या :--    उक्त कविता में निर्वेद भाव का 
के साथ नश्वर काया , जगत का वर्णन  किया
गया है । धन  दौलत  अंत  काल  काम  नहीं 
आता है । सत्मार्ग  परोपकार  द्वारा  ही  हम
परम सुख की प्राप्ति कर सकतें हैं ।
**********************************
*प्रवीण कुमार ठाकुर*  
पतोरा , छुरिया , राजनांदगांव , छत्तीसगढ़  ।
**********************************

No comments:

Post a Comment

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...