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रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगांव , छत्तीसगढ़
विषय -- अंधविश्वास अब मिट रहा है
विधा -- कविता (अनुप्रास अलंकार)
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मिट रहा अंधविश्वास है ,
हर मन में नव विश्वास है ।
हो रहा शिक्षा का प्रसार है ,
हो रहा ज्ञान का प्रचार है ।
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झाड़ फूक के चक्कर में ,
कितनों ने जान गवाएं हैं।
ठग बाबा के झांसे में ,
कितनो ने प्राण लुटाएं ।
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अब नहीं औरत कोई ,
जादू टोने के भेंट चढ़ेंगी ।
लांक्षन अगर लगाए कोई,
न्याय की सीढ़ी चढ़ेंगी।
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नारी अबला नहीं सबला है,
आग में नही अब जलना है।
छल में अब नहीं आने वाली,
ये दुर्गा काली है शेरावाली ।
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बिल्ली रास्ता काटे कोई बात नही,
बाँयी आँखे फड़के कोई बात नहीं।
उल्लू की आवाज़ों से नहीं कोई ,
आफत नहीं आती है नई कोई ।
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कट चुकी हैं अंधविश्वास की बेड़ी ,
शिक्षा की तेज प्रबल तलवारों से।
घायल नहीं होंगी अब बेटियाँ यहाँ,
दहेज की कमजोर टकरारों से ।।
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व्याख्या :-- प्रस्तुत कविता में अंधविश्वास पर
प्रहार किया गया है तथा कविता में यत्र तंत्र
अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है ।
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रचनाकार
प्रवीण कुमार ठाकुर
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