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रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)
शीर्षक -- धरा धरा पर पग धरे
विधा -- दोहा (यमक अलंकार का प्रयोग)
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।।1।।
धरा धरा पर पग धरे , छम छम बाजे साज ।
खग बिन पर उड़ ना सके , पाँव चले पर आज।।
।।2।।
घटा घिरे जल है गिरे , घटा जगत का ताप ।
प्यास मिटी सब जीव की , जीव जंतु संताप ।।
।।3।।
काल काल पर आत है , मरे कोय न अकाल ।
चाल चले सम वेग है , रोक सके ना ढा़ल ।।
।।4।।
कर से कर को लेत है , स्वप्न करे साकार ।
सेवा सुविधा है बढी़ , सोंच लेत आकार ।।
।।5।।
प्राणघात मद पान है , नशा लेत है जान ।
ज्ञान सही ये जान ले , सत्य वचन है मान ।।
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1 धरा = लड़की का नाम , धरा = पृथ्वी ।
पर = के ऊपर , पर = पंख , परन्तु ।
2. घटा = मेघ , घटा घटना , कम होना ।
3. काल = मृत्यु , काल = समय ।
4. कर = टेक्स , कर = हाथ ।
5. जान = प्राण , जान = ज्ञान
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व्याख्या :---
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दोहा के सम्पुर्ण पर में रचनाकार ने यमक अलंकार
का प्रयोग करते हुये सम्पुर्ण दोहे को अलंकृत करते
हुए काव्य की अद्भुत छटा की अभिव्यक्ति दी है ।
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रचनाकार
प्रवीण कुमार ठाकुर
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