बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- छन्द मुक्त कविता
शीर्षक -"पुष्प की कूक"
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बसंत बहार है आई
मादकता है लाई,
आम्र तरूओं ने
देखो ली है अंगड़ाई ।
रंग- बिरंगे फूलों में
तितलियां मंडराईं,
पर्यावरण में फिर से
कादंबरी की कुक सुनाई।
हरित श्रृंगार कर धरा
सुंदरता को पाई,
प्रसन्नता से सारी प्रकृति
मंद-मंद मुस्काई।
'पुष्प' बन कादम्बरी
आज कूक है लगाई,
काव्य संसद परिवार का
मिलन होगा बड़ा सुखदाई।
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