बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- छन्द मुक्त कविता
शीर्षक -"सरहदें"
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ज़मी पर लकीरें कितनी भी खींच दें
दिलों में दरारें ना आने पाए ।
इल्तजा है 'पुष्पा' की सरहदों से
रिश्तों को प्यार से सजाए।
गर कोई लांघ भी जाये सरहदें
अपनेपन से क्यूं न हम फूल बरसाएं।
सरहदें बांध देती खुले चमन को
भूल कर भी बांधें ना मन को ।
स्वच्छंद उड़ना पार सरहदों के
सबको गले से भी लगाना ।
सरहदें नाम की हो जाएंगी
दिलों के मिलने से टू जाएंगी ।
याद रखें, बनाने वाले हम ही थे
सरहदों को, मिटाएंगे भी हम ही ।
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