स्थान- बनाई, तमनार जिला रायगढ़।
विधा- आलेख
शीर्षक- "प्रखर-प्रवाह"
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प्रवाहमान वायु, प्रवाहमान नदी या फिर प्रवाह की प्रखरता लिए हुए मानव मन हो ,उन्माद से भरे हो तो वह शिखर पर पहुंच भी जाए तो जमींदोज होने में समय नहीं लगता है। प्रवाह की प्रखरता के संग प्रवाहित हो जाना सही नहीं उसके साथ तालमेल लाना आवश्यक होता है, पर कभी-कभी तालमेल सामने वाले की समझ से परे हो तो खुद को संभाल लेना बेहतर हो जाता है ।
आवेग और उन्मुक्तता लिए हुए आजकल धारा की प्रवाह इतनी प्रखर और प्रभावोत्पादक होती जा रही है कि कीट पतंगों के संग पूरे काफिले बह जाते हैं ।वे इतने दूर निकल जाते हैं कि पूर्व स्थिति भूल कर भी याद नहीं रख पाते और ना ही भविष्य की उज्जवलता दिखाई देती है ।
प्रवाह प्रखर और निश्छल हो तो वह बहने वालों को साथ लेकर इस तरह बहती है की राह में रोड़ा अटकाने वालों की भरमार होती चली जाती है। बातों के प्रवाह में बहकने वालों की संख्या बहकाने वालों से अधिक मिलती है । दुनिया बदलती जा रही है एक उदाहरण देती हूं -: भूत के पांव की व्याख्या करने वाले लेखक ने कई लोगों को डर के हवाले कर दिया,और दूसरा उदाहरण बिंदास और अपने कर्म क्षेत्र में प्रवाहित होने वाली महिला को समाज की बुरी नज़रों ने घेर लिया ।ऐसे कितने उदहारण मिल जाएंगे समाज की प्रवाहित गंदी भावनाओं में।
प्रवाह ना हो तो जल से बदबू आती है और अधिक प्रखरता हो तो समाज को डूबा देती है ।अतः धरा की धड़कन तभी चलेगी जब प्रवाह कितनी भी प्रखर हो लोग अपनी सोच समझ के साथ बहें, अन्यथा उन्हें डूबने से कोई नहीं बचा सकता ।
सभी के साथ तालमेल रख बढ़ा जा सकता है
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