स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता
शीर्षक -"तरक़ीब"
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तरक़ीब से तकदीर को
बदलते देखा है,
मेहनत से मुकाम को
क़रीब आते देखा है ।
सपने साकार ऐसे
ही नहीं होते,
शक़्स को आजिमे
ख़िदमत करते देखा है।
आशियाने में आराम
ना करना कभी,
आफ़त से आँखें
लड़ाके बात करना।
एक दिन आफ़ताब
जरूर चमकेगा,
ज़ेहन जाहिरा जब
जान जाएगी ।
तरक़ीब तोफाये
तस्लीम इख़्तिया होगा,
नासुते नुसर्त नासमझी
तब मान जायेगी।
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