Friday, August 7, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- चिर सुख

01. रचनाकार का नाम :
देवयानी शुक्ला
02. जिला :- रायपुर (छत्तीसगढ़) 
03. छंद :- मुक्तक (पुनरुक्तवदाभास अलंकार) 
04. रचना का शीर्षक :-

*चिर सुख*

जीवन की सब माया मिथ्या
हर्ष प्रमोद समनार्थ नहीं
सच्चे सुख की राह कठिन है 
बुद्ध हर एक सिद्धार्थ नहीं

सबके अपने-अपने सुख हैं
सबके अपने-अपने दुःख
जाली है कृत्रिम प्रसन्नता 
झूठे हैं सब हर्षित मुख

चरम सत्य से भरे जगत में
कुछ भी परम यथार्थ नहीं

अली कली के स्वांग में उलझा
मधु की आस भी मधुर कहाँ
यह प्रछन्न कारा है पगले 
भटक रहा तू भ्रमर कहाँ 

ये आलिंगन ये अपनापन
कलिका का परमार्थ नहीं

अनादि अनंत के श्रीपद में
अर्पित हो चिर सुख पा लेते
जिसके सान्निध्य में प्रेम बसा
उनको हम सम्मुख पा लेते

किंतु इस जीवन के रण में
माधव तो हैं पर पार्थ नहीं ।
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व्याख्या :-इस कविता में मिथ्या संसार में ईश्वर की शरण को ही सच्चे सुख का उपाय बताया गया है।
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पुनरुक्तवदाभास अलंकार

माया -जादू भरे
मिथ्या - झूठ

हर्ष -खुशी
प्रमोद -मज़ा

बुद्ध -भगवान बुद्ध
सिद्धार्थ -नाम

जाली- जाल से भरा
कृत्रिम- नकली

सत्य -सच
यथार्थ -वास्तविकता

अली -भंवरा
भ्रमर -भ्रमित

मधु -शहद
मधुर -मीठा

अनादि -ईश्वर
अनंत -विष्णु

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