०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- श्रमबिंदु
०४. विधा :- मुक्तक (अपह्नुति अलंकार)
*श्रमबिन्दु*
तुमने ही तो चौक पुरे हैं
हर घर की चौखट में
तुमने ही तो मधुर सुरीले
गीत भरे पनघट में
तुमने सतत् प्रयासों से
बंजर धरती पर खेत गढ़े
वसुधा के फीके आंचल पर
फसलों के माणिक्य जड़े
तुमने रचकर ईंट ईंट पर
माटी को आकाश किया
तुमने अपराजित शिखरों के
साथ बैठ परिहास किया
तुमने ही तो व्याख्या की है
पीड़ा की और हर्ष की
तुमने ही तो नींव बुनी है
प्रगति की उत्कर्ष की
नहीं कर्मरत बाहु युगल ये ब्रह्मा के प्रतिरूप हैं
श्रम आनन का प्रखर तेज है
ये ना समझो धूप है
तुमने ही तो दिखलाई हैं
राहें सुख सम्मान की
हे श्रमबिन्दु !!! तुमने झर कर
धुन छेड़ी नवगान की
---------------------------
अपह्नुति अलंकार
* नहीं कर्मरत बाहु युगल ये ब्रह्मा के प्रतिरूप हैं
* श्रम आनन का प्रखर तेज है
ये ना समझो धूप है*
No comments:
Post a Comment