*देवयानी शुक्ला*
2. जिला :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
3. छंद :- मुक्तक *(श्लेष वक्रोक्ति अलंकार)*
4. रचना का शीर्षक :-गगन के दीप
किस गगन की सैर पर
निकले पतंग तुम ?
जिस गगन के दीप बन
निकले पतंग तुम ।
चाल ये, क्या ठाठ ये
और ये प्रखरता !!!
दोपहर में दिवस का
यौवन निखरता ।
साथ ले आए हो
बचपन की तरंग तुम ।
हो गए हो अश्वमेध के
तुरंग तुम ।
क्यों भला सर पे
सभी के तन गए हो ?
तुम भी तो मर्ज़ी के राजा
बन गए हो !
अपनी ऊर्जा देख क्यों
होते हो दंग तुम ?
होड़ जैसे कर रहे हो
मेरे संग तुम ।
अपनी क्षमता को
सदयता से बरतना ।
दीन दुखियों के सदा
संताप हरना ।
सांझ की बेला में भर दो
थोड़े रंग तुम ।
हर निस्संग को थाम लो
बन अंतरंग तुम ।।
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व्याख्या - कविता में दोपहर के सूर्य और जीवन की दोपहर के सूर्य अर्थात् युवा शक्ति के मध्य
उनकी शक्ति,सामर्थ्य और कर्त्तव्य के विषय में वार्तालाप है।
दोनों ही एक दूसरे को संसार के कल्याण के लिए प्रेरित कर रहे हैं ।
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*श्लेष वक्रोक्ति अलंकार*
पतंग (1) पक्षी (युवा)
पतंग (2) सूर्य
दोपहर (1) -अपराह्न
दोपहर (2) -युवावस्था
सांझ -वृद्धावस्था
रंग -आनंद
संपूर्ण कविता में श्लेष वक्रोक्ति है।
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