०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. विधा :- मुक्त छंद
०४.शीर्षक :- राजमार्ग
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*राजमार्ग*
मेरे पड़ोस की सड़क
जो कि राजमार्ग कहलाती है ,
अपनी ही सीमा से लगी
नदी की कलकल
अक्सर सुन नहीं पाती है ।
बेचारी सड़क......
सदा रहती है व्यस्त ,
व्यथित ,विह्वल ।
बिजली के तारों पर सजी
पंछियों की चौपाल में
ठहर नहीं पाती दो पल ।
निरख नहीं पाती है
उस सुंदर दृश्य को नयन भर ,
जिसे निहारते हैं
कितने ही प्रेमी युगल
उसी की गोद में बैठकर ।
वो तो बेचारी
कर्त्तव्य भार से
हमेशा हांफती रहती है ।
गाड़ियों की फटकार और
टायरों की चिंघाड़ से
सदा कांपती रहती है ।
जिसे मिलती है
गालियाँ जन से और
उपेक्षा तंत्र से ,
वो सड़क परिचित है ,
झूठी दिलासा और
सच्चे षड़यंत्र से ।
उसकी पथरायी देह
दिन भर सबका भार ढोती है ।
रात में एकाध पहर को
जब कुछ एकांत पाती है ,
तो फफक कर रोती है ।
कहने को तो वो राजमार्ग है ,
पर उसे सुख है न चैन ।
मैं छत से जब मुस्कुरा कर देखती हूँ उसे ,
तो चुरा लेती है नैन ।
अपनी गरिमा के
विदीर्ण मखमल को
सरकारी टाट से छिपाती है ।
मेरी पड़ोस से गुजरती सड़क....
इस दीनता में भी
राजमार्ग कहलाती है ।
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