०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- चल माँ पढ़
०४. विधा :- मुक्तक (उत्प्रेक्षा अलंकार)
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*चल माँ पढ़*
चूल्हा चौका बहुत हुआ माँ
चल अब क ख ग भी पढ़
दुनिया को न ताक उचक कर
दो सीढ़ी शिक्षा की चढ़
"क्या कर लूंगी मैं लिख पढ़ के ?"
ऐसा तो बिलकुल मत सोच
अनपढ़ की जो छाप है तुझ पर
चल उठ अपनी कलम से पोंछ
भाग रही है सरपट दुनिया
दौड़ लगा चल उसे पकड़
दो सीढ़ी शिक्षा की चढ़
कल जो तुझको चिठ्ठी भेजूँ
किससे कहेगी बाँच दे वीर
अपने जी की जी में रखेगी
कह न सकेगी मन की पीर
जब तू जागे तभी सवेरा
चल उठ अपनी किस्मत गढ़
दो सीढ़ी शिक्षा की चढ़
जंगल के पत्ते बूटे पर
तेरे श्रम की छाया है
इस अजेय व्यक्तित्व में मानो
सारा वन ही समाया है
थोड़ा श्रम शिक्षा पर कर ले
चल अपने अज्ञान से लड़
दो सीढ़ी शिक्षा की चढ़
माना नदियाँ,पर्वत,गह्वर
जैसे तेरे सहचर हैं
लेकिन एक अलग ही दुनिया
इस वन प्रांत के बाहर है
विद्या के कुछ हीरे-मोती
चल अपने व्यक्तित्व पे जड़
दो सीढ़ी शिक्षा की चढ़
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व्याख्या -
प्रस्तुत कविता में एक एक शिक्षित वनवासी बालिका अपनी कर्मठ किंतु अशिक्षित माँ को पढ़ने के लिए प्रेरित कर रही है ।
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उत्प्रेक्षा अलंकार
*इस अजेय व्यक्तित्व में मानो
सारा वन ही समाया है
*माना नदियाँ,पर्वत,गह्वर
जैसे तेरे सहचर हैं
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