जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
शीर्षक- औरतें गाँव की
विधा- मुक्त काव्य
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गाँव की औरतें चूल्हे में पकाती है खाना
और खुद भी पकती हैं ताप से!
दुःखों को पी लेती हैं! धुएँ को जैसे पीती हैं
गाँव की औरतें चल लेती हैं नंगे पाँव
नदी नालों खेत खलिहानों में ,
नहीं रोक पाती उनकी राह
सावन भादो की अनवरत झड़ी,
न तपती हैं वो, जेठ बैसाख के महीनों में!
गाँव की औरतें स्वच्छन्द नहीं होती
कैद भी नहीं होती घरो में, मखमली लिबास पहने,
खेतों में मिट्टी पानी के साथ घुलती मिलती हैं,
जानती हैं वो चादर की लंबाई,
छोटी सी कुटिया में, बिता देती हैं अपना जीवन
एक चीथड़े में ढंक लेती हैं अपने तन
मांग थोड़ी सी ही होती हैं उनकी
थोड़ा सा प्रेम थोड़ा सा अपनापन !
अपने लिए नहीं जी पाती वो !
बच्चे और परिवार के लिए ही जीती हैं
उनकी खुशी में ही ढूंढ लेती हैं अपनी खुशी
हर दरार को सी लेती हैं स्नेह की धागों से !
कमजोर नहीं होती गाँव की औरतें
शालीन होती हैं, मर्यादा में बंधी!
हर मुसीबत को झेल जाती हैं
कभी गदल तो कभी धनिया बनकर
आंच नही आने देती अपनों पर
अपने हक से ज्यादा फर्ज को जानती हैं वो
हर माहौल में ढल जाती हैं
निराशा और हताशा में भी ढूंढ ही लेती हैं आशा !
फूलों की चाह में काँटों के चुभन भी सह लेती हैं
टूट जाती हैं खुद पर,
घर को टूटने नहीं देती ! औरतें गाँव की
~ गावस्कर कौशिक
स्वरचित
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