जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
विषय - छतीसगढ़ के संत
शीर्षक- गुरु पइयाँ लागंव
विधा - गीत
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गुरु पइयाँ लागंव तोर......
सुरता राखे रहिबे मोर.......
तैं बढ़ ग्यानी सत के पुजारी
सत के रददा मोला दिखादे
जाति-पाति छुआ-छूत बाढ़े
मनखे मनखे के भेद मिटादे
अंधियारी छाए घनघोर
भटकत हंव गली खोर......
गुरु पइयाँ लागंव तोर..........
मैं अग्यानी निचट हंव दीन
भर दे मोर ग्यान के गागर ल
बीच भँवर म फंसे मोर डोंगा
पार लगादे गुरु भवसागर ल
तोर हाथ हावय न,
तोर हाथ हावय न,
मोर जिनगी के डोर
मोह के बंधना ल टोर...
गुरु पइयाँ लागंव तोर..............
तोर एक दरस पाये खातिर
इहाँ उहाँ खोजत रहिगेंव मैं
खुलगे अब अन्तस् के आँखि
गुरु घट घट म बिराजे हच तैं
तोर रुपे हे अपार
तोरे रुपे हे अपार
नइहे कोनो ओर छोर.......
गुरु पइयाँ लागंव तोर..............
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