ग्राम-बुलाँकी ,रायगढ (छ. ग.)
दिनांक -20/05/2021
दिन -गुरूवार
विधा -कविता
शीर्षक - "इंसान की करतूत"
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*इंसान की करतूत*
इंसान ने इंसान का ,
गला घोट डाला ।
सुविधा संग्रह के चक्कर में ,
अपनों को मार डाला ।
यह कैसे शिक्षा नीति है,
यह कैसे ज्ञान की प्रेरणा।
अपनों का पहचान नहीं है,
जी रहे हैं ,संवेदना ।
अपने पराए की काला दीवाल से,
तुम, कब तक निकल पाओगे।
नफरत की गर्त में डूब कर तुम,
कब तक जी पाओगे ।
कैसे मति है मानव की ,
पोषण ही स्वयं का भूल गये।
खुद का शोषण कर मानव ने ,
खुद का लुटेरा बन ये।
बेशुमार विलासिता से मानव,
मन तुम्हारा भरा नहीं ।
अपराध की प्रवृत्ति में डूबा ,
तुम स्वयं से क्यों डरा नहीं ।
उम्र ढल रही है तुम्हारा ,
तुम कब चलोगे प्रेम की राहें।
बिंदास जिंदगी जी लो तुम ,
आगे जिंदगी मिले ना मिले।
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उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़
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