विधा-कविता (छंद मुक्त)
विषय -अकिंचन
दिनांक -09/06/2021
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*अकिंचन*
माता तुम्हारे चरणों में ,
मैं शीश झुकाती हूँ।
तेरे ममता की आंचल में,
मै दुनियाँ बसाती हूँ।
मै ऋणी अकिंचन माता।
तेरा ऋण कैसे मैं चुकाऊँ।
श्रम सेवा बलिदान देकर ,
तेरी फर्ज अदा कर पाऊँ।
माँ मान रहे सम्मान रहे,
मैं गीत तुम्हारी गाती हूँ ।
तेरे रज कण एहसान को,
माँ मै भूल नही पाती हूँ।
कर्ज तुम्हारे बहुत है माता,
मै कर्ज कैसे चुका पाऊँ।
मै तुच्छ अकिंचन मानव हूँ,
तेरा उपकार कैसे कर पाऊँ।
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उर्मिला सिदार रायगढ छत्तीसगढ़
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