विधा- आलेख
विषय - विचार
दिनांक - 01/06/2021
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*विचार*
विचार जीवन का एक वास्तविक वस्तु है ,जो सूक्ष्म भाव को प्रकट करती है। मानव दो वास्तविकता का बना है ।शरीर और मन, मन अर्थात जीवन, मन को ही जीवन नाम से अभिहित किया जाता है। शरीर+जीवन= मानव स्वरूप है। शरीर से कार्य और जीवन में समझ होती है। जिस तरह कई अंगों से मिलकर शरीर का स्वरूप बना है ।ठीक इसी तरह जीवन पांच अंशों का बना है ।जो उनेक क्रियाओं से पहचाना जाता है। दिखता नहीं शरीर से व्यक्त होने से एहसास किया जाता है। जिस तरह हवा दिखता नहीं एहसास किया जाता है। ठीक उसी तरह जीवन की अशों को देखा नहीं समझकर एहसास उनकी क्रियाओं से किया जाता है। जीवन का मध्यांस आत्मा, उसके प्रथम परिवेश में बुद्धि,द्वितीय में चित, तृतीय में वृत्ति और चतुर्थ में परिवेश में मन होता है। इस तर 5 अंशों से बना जीवन को शरीर से व्यस्त होने से पहचानते हैं। जीवन का अर्थ है जीव+न = न्याय ,हर मानव का जीवन न्याय पूर्वक जीना चाहता है और निरंतर जीना चाहता है, इसलिए परंपरा में जीवन का एक नाम अमर आत्मा है ।क्योंकि जीवन(आत्मा)कभी मरती नहीं है ,अमर है। उसी जीवन का एक अंश वृत्ति है ,जो हम सोच विचार करते हैं ।वह वृत्ति का कार्य है अतः हम सही गलत जो भी विचार करते हैं ।वह जीवन की वृत्ति है ।वृत्ति में 6 दृष्टि से विचार उद्भवित होते हैं। प्रिय, हित,लाभ विचार और दूसरा न्याय,धर्म,सत्य, विचार 6 विचारों को वृत्ति संचालित करता है। प्रिय, हित, लाभ विचार शरीर सापेक्ष होता है और न्याय, धर्म, सत्य, विचार आत्म(जीवन) सापेक्ष होता है। वर्तमान समाज में वृत्ति का विचार ज्यादा तर प्रिय,हित, लाभ की तरफ उन्मुख है।अर्थात शरीर सापेक्ष है। वर्तमान में मानव जो भी व्यवहार कार्य कर रहा है, शरीर के लिए कर रहा है। शरीर भौतिक वस्तु है। और इसके पूर्ति के लिए कार्य करना भी भौतिक वस्तु है। वर्तमान में इन्ही भौतिक वस्तुओं को श्रेष्ठमान कर ही जी रहे हैं जो क्षणिक सुविधा से सुख भाषता है। हर पल सुविधा की निरंतरता नहीं है ।सुविधा सामायिक, मात्रात्मक है ।इसीलिए मानव साधन संपन्न होते हुए दुःखी है। दूसरा वृत्ति का कार्य न्याय, धर्म, सत्य है ।इसका तो वर्तमान समाज में अता पता ही नहीं है। सिर्फ भाषा रूप में सुनने के लिए मिलता है ,प्रमाण नहीं। न्याय पूर्ण व्यवहार, धर्मपूर्ण विचार, सत्यपूर्ण सहअस्तित्व होता है। मानव- मानव के साथ व्यवहार भावपूर्ण होता है।समाधान के लिए विचार होता है ।जब भी मानव कोई भी व्यवहार कार्य करता है ।तो समाधान के लिए करता है ,न की समस्या के लिए। क्रिया की उपयोगिता की समझ न होने से कार्य व्यवहार असफल हो जाता है। विचार के पूर्व अनुभव, अनुभव के पूर्व ज्ञान, संपन्न होना होता है। बिना ज्ञान का अनुभव, बिना अनुभव का विचार, बिना विचार का व्यवहार, बिना व्यवहार का कार्य, बिना कार्य का सफलता(उपलब्धि)नहीं मिलती है। अतः विचार हमेशा समाधान के लिए करना चाहिए। तभी सफलता मिलती है। समाधान पाना ही हमारी लक्ष्य है। समझ से समाधान, श्रम से समृद्धि, विश्वास से अभय, सर्वतोमुखी समाधान के साथ जीना ही मानव जाति का लक्ष्य है। जिसे जागृति भी कहा जाता है।इसे मोक्ष भी कहा जाता है। बिना जागृति का मोक्ष नहीं है।अतः हम मानव जाति जब भी विचार करें हमारा, विचार व्यवस्था के अर्थ में समाधानित हो न्यायिक हो ,सर्वमान्य हो। बिना विचार का कार्य व्यवहार होता नहीं ,अतः अपना विचार को कहां लगना है हर मानव तय कर सकता है।विचार को प्रिय, हित,लाभ में लगाना है ,कि न्याय, धर्म, सत्य में लगाना है। यह अधिकार हर मानव के पास विचार रूप में रखा है। अतएव अपने विचार को न्याय में लगाना है अन्याय में, धर्म में लगाना है, कि अधर्म में, सत्य में लगाना है या असत्य मे, हर मानव स्वयं निर्णय लेकर विचार को प्रमाणित कर सकता है।विचार व्यवहार कार्य से श्रेष्ठ है ।अतः अपने श्रेष्ठ विचार का सदुपयोग कर जीवन सार्थक बनाना है या दुरुपयोग कर निरर्थक बनाना है ।यह स्वयं निर्णय ले सकते हैं। धर्मपूर्ण विचार के साथ सुख- समृद्धि पूर्वक सहअस्तित्व के साथ जी सकते हैं।
धन्यवाद
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उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़
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