Friday, May 21, 2021

उर्मिला सिदार कृत आलेख- माँ

रचयिता -उर्मिला सिदार 
ग्राम-बुलाँकी 
जिला -रायगढ(छ.ग.)
विषय-  "मांँ "
विधा-आलेख
दिनांक-  21/05/2021
दिन - रविवार
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          *मांँ का मातृत्व*
मांँ का मातृत्व का तात्पर्य है-  मांँ की ममता मूल्य आचरण।
ममता भाव पोषण के अर्थ में होता है। मांँ अपनी सपूतों को प्रतिरूप भाव से स्वस्थता का ध्यान रखकर शरीर पोषण के अर्थ में ममता मूल्य का निर्वहन करती है। साथ-साथ मानसिक स्वस्थता अर्थात संस्कारिक ज्ञान व्यवहार के लिए मन का पोषण कराती है। मन और तन दोनों की स्वस्थता के लिए मांँ ममता मूल्य का निर्वहन करती है। हर औलाद को मांँ से मुख्यतः तीन वस्तु (वास्तविकता) वरदान स्वरुप मिलती है:-(1) हर मनुष्य का शरीर मांँ और पिता दोनों की सह अस्तित्व से प्राप्त होता है ।औलाद का शरीर मांँ -पिता का दिया हुआ स्वरूप है। औलाद की शरीर में मुख्य रूप से माता-पिता का हक रहता है।
(2) माता अपनी औलाद की शरीर पोषण का ध्यान नि:स्वार्थ भाव से उसकी स्वस्थता की कामना के साथ निर्वहन करती है। (3) मांँ हर पल, हर क्षण अपनी औलाद के प्रति शुभकामना करती है। कि इस संसार में मेरा औलाद परिवार, समाज में विश्वास, सम्मान व निर्विरोध पूर्वक स्नेह भाव से जी सके। श्रेष्ठता के प्रति कृतज्ञता का भाव उनमें बना रहे, ताकि समाज में श्रद्धा पूर्वक सेवा भाव से गौरवान्वित हो जी पाए। माँं अपने पुत्र-पुत्रियों के प्रति स्नेह और ममता भाव से पोषण करते हुए उनसे अपेक्षा विहीन उनकी विकास और जागृति का कामना करती है। औलादों की खुशी में अपनी खुशी ढूंढती है। हर मनुष्य का तीन अहम सर्वोपरि संबंध होता है, मांँ-पिता और गुरु । माता-पिता औलादों के पोषण संरक्षण के रूप में और गुरु जागृति के अर्थ में पूज्य माने जाते हैं। अत: हर इंसान को इन तीन संबंधों के प्रति हर पल हर क्षण अनुस्युयत कृतज्ञता भाव होनी चाहिए। यही तीनों संबंध हमारे सफल जिंदगी जीने का आधार है। अतः हमारे आधार स्तंभ का हमेशा विश्वास के साथ स्वीकार करते हुए ,उनका हमेशा सम्मान करें। इन प्रमुख आधार स्तंभों में हमारी मांँ भी एक स्तंभ है। जो एक साये की तरह जिंदगी भर एक पहरेदार की तरह हमारी रखवाली कर , हमारी विकास और जागृति में सहयोग कर, हमें संस्कारिक बनाती है। मांँ जब तक जीती है ,तब तक परिवार में सह अस्तित्व भाव से जीती हुई, परिवार की धूरी होती है। समाज का कर्णधार एक शिक्षक होता है। उसी तरह मांँ भी परिवार की कर्णधार होती है। अत: हमारी धुरी स्वरूप मांँ का सदैव सम्मान करें, उनकी कृतज्ञता स्वीकार कर, सफल जिंदगी की बुलंदियों को छू लें। मांँ का आशीर्वाद हमेशा अपने सपूतों के लिए न्यौछावर रहती है। अतः हर इंसान को मांँ पर विश्वास और सम्मान बना रहे ।ऐसा व्यवहार कार्य करना है। ताकि हम अपने मांँ से मिली संस्कार का परिचय समाज में मानवीय भाव से दे सके। साथ-साथ गौ मांँ और धरती मांँ का  भी ख्याल रखें। 
**मां तेरी ममत्व को प्रणाम** 
मांँ गम की  राहे, तन्हाई जिंदगी में,  तुझे याद करते हैं।
तेरी आशीर्वाद और प्रेरणा से, सुखी होने की चाहत रखते हैं।
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उर्मिला सिदार बुलाँकी रायगढ़ छत्तीसगढ़

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