पेंडरवानी , बालोद ,छत्तीसगढ़
विषय - मोह
विधा - आलेख
मोह
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मोह एक ऐसी मानवीय प्रवृत्ति है जिसमें पड़कर इंसान देना भूल जाता है। किसी व्यक्ति , वस्तु या भावना से वंचित नहीं रहना चाहता। उसी के इर्द - गिर्द एक ऐसा सुखद वातावरण पाना चाहता है जिससे उनकी निकटता बनी ही न रहे बल्कि उसमें निरंतर वृद्धि भी हो। इस तरह मोह एक ऐसी मानवीय दशा है जिसमें व्यक्ति अपने प्रिय व्यक्ति , वस्तु , भावना इत्यादि न छूटे ,जिसके उलझन भरे धागों में बांधकर उलझता ही चला जाए।
जहाँ लोभ में निरंतर पाने की लालशा होती है तो मोह में खो न देने का बंधन बनी रहती है। लोभ अतृप्त इच्छाओं के पीछे इस कदर भगाता है जिसमें पड़कर इंसान वर्तमान के सुख से वंचित हो जाता है जबकि मोह ऐसा बंधन बांध देता है जिसमें इंसान अपनी वर्तमान में उलझकर श्रम विहीन , आत्मकेंद्रित , लिप्सावश अंधा हो जाता है, न्याय व तर्क से दूर हो जाता है। लोभ इच्छा वश असीमित दिखाई पड़ता है जबकि मोह में इंसान सिमटते जाता है।लोभ का सकारात्मक पहलू उसे श्रम या प्रयास करने के लिए प्रेरित करता है , मोह अज्ञानता व भ्रामक होता है।
मोह यदि व्यक्ति के प्रति हो तो उसके उन्नति के मार्ग में बाधक हो जाता है जिससे उसका सर्वांगीण विकास नही हो पाता , वो विपरीत परिस्थितियों में लड़ने लायक नही रह जाता। यदि वस्तु के प्रति हो तो उस वस्तु का विछोह घातक तो नही पर कष्टकारी व निराशा से भर देने वाली होती है ,परंतु किसी भावना जैसे प्रेम या वासना के रूप में सामने आए तो कभी - कभी प्राणघातक भी हो जाता है।
इंसान के अंदर पाँच मनोविकार काम , क्रोध , लोभ , मोह व अहंकार होते हैं। जो मानव को मानवीयता से दूर कर देता है जबकि दया ,प्रेम , विनम्रता ,परोपकार व क्षमा वे मानवीय मूल्य हैं जिससे लोग आपस मे बंधकर रहते हैं ,दुनिया इन्हीं के कारण गतिमान है। ये सौहार्द व भाईचारे को बढ़ाता है।
मानव विकारों से युक्त है परंतु भगवान ने उन्हें विवेक की ताकत दी है। जिसका सही उपयोग से , मानवीय मूल्यों को स्थापित कर सकता है। अपनी समझ से यह जान जाता है कि दुनिया जो बाहर दिख रहा है वह सब बांधकर रखने वाला है मोह है , और जो इस फेर में नही पड़ता वही सच्चे महात्मा है,परमात्मा है। जब व्यक्ति को इस बात का आभास होना शुरू होता है, वह इस बंधन से परे , मोह से दूर चला जाता है। जो व्यक्ति महात्मा नही सांसारिक है वे जीवन मे इन विकारों का यथावसर प्रदर्शन करता ही है पर अपने मे मानवता भी बनी रहे इसलिए इन विकारों को नियंत्रण में रखकर आचरण भी करता है।
- - शैलेन्द्र चेलक - -
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