पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विषय - दिवास्वप्न
शीर्षक - दिवास्वप्न ( मुक्त छंद)
दिवास्वप्न
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दिवास्वप्न कल्पित जग है ,
विचलित कर देता है मन ,
वर्तमान के आँगन में ,
पैदा करता भावी उलझन ,
सुखद स्वप्न की अभिलाषा ,
अकर्मण्यता से न हो पूरा ,
श्रम बिन केवल परछाई है ,
भावी जीवन का स्वर्ण कंगूरा ,
कल्पित जग में विचरण करना,
असफलता का परिचायक है ,
यथार्थ धरातल पर टूटे सपनें ,
निराशा व पीड़ादायक है ,
पर दिवास्वप्न पग बाधा नहीं ,
नये राह भी है दिखलाता ,
सपनों को साकार बनाने ,
अनेक उपाय है सिखलाता ,
दिवास्वप्न सच -सुंदर करने ,
दिन - रात जागना पड़ता है ,
लक्ष्य दिशा में अर्जुन जैसा ,
श्रम साधना पड़ता है ,
- - शैलेन्द्र चेलक - -
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