पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विषय - खिलौना
शीर्षक - इंसान बना खिलौना है
इंसान बना खिलौना है
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इस यांत्रिकी युग में देखो ,
सामानों की भरमार है ,
यंत्रो से बढ़ रहा मोह है ,
संबंधों में घट रहा प्यार है ,
भावशून्य हो चले हैं जन -जन,
यंत्रो से अटा हर कोना है ,
इन खिलौनों के हाथों अब ,
इंसान बना खिलौना है ,
दिखता न देवर -भाभी के किस्से ,
न ननद - भौजाई के तकरार ही ,
न कहते कोई परियों की कहानी ,
रही न दादी - पोती की प्यार ही ,
क्या ? समझदार हो चलें हैं अब सब ,
जो मिठाई को न रोना - धोना है ,
इन खिलौनों के ...
सच है तकनीकों से उन्नति मिली ,
जगह -जगह ये हथियार बने ,
हर जेब मे पड़ा मोबाइल है अब ,
वाट्सएप-फेसबुक ही परिवार बने,
जिनके साथ बिताते घंटों ,
संग उसी के जगना - सोना है ,
इन खिलौनों के ......
रत रहते दिन - रात इसी में ,
अब नींद कम ही आता है ,
खीझ - खीझकर अपनों से ,
हर कोई चीखता है , चिल्लाता है,
रिश्ते अब देखो दूर हो चले ,
इस बात का ही तो रोना है ,
इन खिलौनों के हाथों अब ,
इंसान बना खिलौना है ,
- - शैलेन्द्र चेलक - -
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