पेंडरवानी , बालोद ,छत्तीसगढ़
शीर्षक - सखि बसंत आयो रे
सखि बसंत आयो रे
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सखि बसंत आयो रे ,
मन भौरा भरमायो रे ,
विरह में नयनजल छलके ,
पिय की राह निहारती पलकें ,
कोयल की गाने ,
विरह में लगती ताने ,
मधुर गीत न सहायो रे ,
ले गया बैरी अधरों की हँसी ,
मन बैरी क्यों जा फसी ,
न जाने उस निष्ठुर की जाल में ,
दुख न होता , वो न होता ,
रहती अपने हाल में ,
ऋतुराज छेड़े मुझको ,
अब कसक न भायो रे ,
वह धुंधला चेहरा सामने आया ,
हिलोर उठा मन हर्षाया ,
मन को मिला मनमोहन प्यारे ,
खिली कलियाँ , गूंजे गलियारे ,
अधरों की हँसी फिर लौट उठी ,
विरह के पल , अब जा के टूटी ,
पिय की प्यारी , राजदुलारी ,
बरबस ही यह गायो रे ,
सखि बसंत आयो रे ,
- - शैलेन्द्र चेलक - -
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