पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विषय - विचार
विधा - आलेख
शीर्षक - विचार ही व्यक्तित्व दर्शाता है
विचार : अंतःकरण में किसी विषय पर तर्क - वितर्क ।मनुष्य समाज में अपने विचार प्रदर्शन से ही जाना जाता है , कि अमुक व्यक्ति अच्छा है या बुरा । किसी विषय को प्रमाणों के साथ सार्वभौमिकता के धरातल पर प्रस्तुत कर स्वयं को सिद्ध करना हमारी वैचारिक विशेषता होती है। हम समाज मे अपने अच्छे या बुरे विचारों से ही अपना आचरण प्रदर्शित करते हैं। हम स्वयं अपने विचारों से प्रभावित होते हैं।
मनुष्य के मन मे प्रायः दो प्रकार के विचार उत्पन्न होते हैं - सकारात्मक और नकारात्मक। सकारात्मक विचार - सकारात्मक विचार असंभव में संभव , निराशा में आशा , नाउम्मीदी में उम्मीद की किरण तलाशता है। पिछले क्षण से बेहतर आने वाले क्षण को बनाता है। अथक निरंतर प्रयत्नशील रखता है। सकारात्मक व्यक्ति सदैव ऊर्जावान बने रहते हैं। कोई पूर्वाग्रह या धारणा ऐसे व्यक्ति का पग बाधा नही बन सकता ।
तोड़ निराशा के बंधन प्रगति पथ पर बढ़ता है ,
प्रेम प्रवाह नदिया सा चट्टानों से लड़ता है ,
उलझी गुत्थियाँ सुलझे पल में ,
जब इंसान सकारात्मक हो चलता है ,
नकारात्मक विचार - नकारात्मक विचार मनुष्य को यथास्थिति से और नीचे गिराता है। व्यक्ति की गतिशीलता समाप्त कर देता है, परिणामतः अवसाद जन्म लेता है। नकारात्मक विचार दूसरों में भी निराशा व असफलता फैलाता है। छोटी सी छोटी परेशानी नकारात्मक व्यक्ति के लिए पहाड़ सा प्रतीत होता है। वो भूल जाता है कि हर समस्या का हल है या समस्या में ही हल छुपा है। ऐसे व्यक्ति पूर्वाग्रह एवं धारणाओं से ग्रस्त हो जाता है। उसे हर काम मे असफलता की आशंका रहता है। वह "अकेला चना भांड नही फोड़ सकता " इसी सोच में चलता है। जबकि सकारात्मक व्यक्ति अपनी कुव्वत दुनिया बदलने के हिमायती होते हैं।
प्रायः व्यक्ति की वैचारिक धरातल उसके वातावरण जिसमें घर -परिवार , उसका मित्र मंडल , शिक्षा का स्तर , सामाजिक स्थिति इत्यादि आता है से प्रभावित होता है। मनुष्य की मेधा का विस्तार व्यापक है। फिर भी वह सकारात्मक व नकारात्मक सोच के कारण ही उसका सदुपयोग या मूढ़ स्थिर बना रहता है। इंसान के बौद्धिक क्षमता ही उसे अन्य प्राणियों से भिन्न या श्रेष्ठ बनाता है। बाघ को आता देख हिरण जान बचाने दौड़ता है पर नकारात्मक व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों पर अकर्मण्य हो जाता है तो ऐसे में क्या वह मनुष्य भी है ? सकारात्मकता मनुष्य की वह शक्ति है जिससे वह मौत को मत देता है। इसलिए सदैव सकारात्मक रहे।
- - शैलेन्द्र चेलक - -
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