Thursday, June 3, 2021

शैलेन्द्र चेलक कृत रेखाचित्र- अंधविश्वास

लेखक - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़ ।
विषय - अंधविश्वास
विधा - रेखाचित्र

         अंधविश्वास
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           मनुष्य जब व्याधियों से घिर जाता है , तब उसके मन में किसी अदृश्य नकारात्मक शक्ति द्वारा सताए जाने का भ्रम इस तरह लिपट जाता है जैसे कोई परजीवी अपने पोषक जीव से लिपटा रहता है। इस दशा में समाज में फैली कई अंधविश्वासों को वह सच समझने लगता है।वैज्ञानिक शोधों , दवाइयों , इलाज के उन्नत पद्धति को भी धता बताने लगता है। शायद तभी सुशीला भाभी अपने माइग्रेन और अर्थराइटिस की बीमारी को पढ़ी - लिखी और ओहदे पर होते हुए भी जादू - टोना , तांत्रिक प्रभाव मानती थी। एक बार मदन भैया  (मेरे बुआ का बड़ा लड़का )अंधविश्वास पर अपना आपबीती सुनाए थे।
           मदन भैया के साथ दूरस्थ जंगल में बसे बावाडोंगरी गांव में ओझा के पास समस्या का समाधान ढूंढने जाते समय रास्ते पर ऊँचे - ऊँचे सागौन के पत्तो से टकराकर कानों को छू कर जाने वाली हवा का एक -एक  झोंका सुशीला भाभी को इस तरह का आभास करा रही थी मानो किसी तांत्रिक शक्ति उसे ओझा के पास जाने से रोक रहा हो । वनप्रांत पर सन्नाटे को चीरता अचानक सुनाई देने वाली चील की कर्कश ध्वनि मानो उसे अभी के अभी जमीदोज करने उतारू है। वह डरी सहमी मोटरसाइकिल पर बैठे मदन भैया को कसकर पकड़ ली।
मदन भैया - अरे सुशीला डॉक्टर साहब ने तुम्हें बहुत समझाया कि माइग्रेन और अर्थराइटिस है। इसी वजह से सिरदर्द , हाथ -पैर के जोड़ों में दर्द बना रहता है। कुछ महीने लगातार दवाई लेने से ठीक हो जाएगी।पर तुम उनकी भी नही सुनी।
सुशीला भाभी - (झल्लाकर )जब परेशानियों का सामना खुद करता है न तब इंसान समझता है कि कोई शारिरिक बीमारी है या किसी के जादू - टोने का भयंकर परिणाम है। तुम तो अभी मुझे बावाडोंगरी पहुँचाओ बस।
           जब किसी व्यक्ति के मन में अंधविश्वास का दीमक घर कर जाए तो वह उसके बौद्धिक धरातल को केवल चट नही कर जाता बल्कि किवदंतियों का काल्पनिक बाम्बी भी उसके आसपास निर्मित होने लगता है। मदन भैया इस बात को समझते हुए सुशीला भाभी के मन पर पड़े मनोवैज्ञानिक कुप्रभाव को दूर करने बावा डोंगरी ओझा के पास ले जाना ही उचित समझा ।
       बेल और नीम के पेड़ से आच्छादित आँगन में बूढ़ादेव स्थापित है। धूप और अगरबत्ती के सुवासित गंध बिखरे पड़े हैं। बांस के अपरिपक्व और अनियमित आकर के ठूठ पर कुंकुम का लेप , देवी- देवताओं का तैल चित्र , मोटी बाती पर जलता दिया , ओझा के माथे पर उन्नत कुंकुम , अपने रोगों को दूर कराने आये लोगों का जमावड़ा से पूरा माहौल तांत्रिक स्थल का जान पड़ता था।
      अपनी बारी आने पर सुशीला  भाभी सारा हाल सुना दी। फिर ओझा की बातों में हां मिलाती चली गई। पंद्रह दिन बाद फिर आने कहते, हाथ मे कुछ पुड़िया थमाते उन्होंने कुछ सुने - अनसुने मंत्रो का धीमे आवाज में वाचन कर भभूत फूंका। दस दिन में इन उपायों को अपनाने से तेरी समस्या नही के बराबर रह जायेगा ।
        उनके तांत्रिक उपचार से प्रसन्न सुशीला भाभी घर लौटी। कुछ दिनों तक खुराक लेने से उसे समस्या कम होने का आभास हुआ। मदन भैया उस पर हुए बदलाव के चलते खुश तो था। पर वह जानता था कि यह सुशीला भाभी पर मनोवैज्ञानिक असर है। जैसे किसी को बुखार आने पर बिना सुई लगवाए ठीक नही होने की धारणा एक सुई लगवा देने से चली जाती है जबकि दवाई लेने से ही वह ठीक हो सकता था। ओझा ने पूड़ियों के साथ डॉक्टर की दवाई लेते रहने का सुझाव दिया था। पंद्रह दिन बाद फिर गए ओझा फिर पुड़िया थमा दी। सुशीला भाभी ओझा के उपचार को सही मानते हुए डॉक्टरी दवाइयों को खाना बंद कर दी। परिणामतः पखवाड़े भर में समस्या फिर बढ़ना शुरू हो गया। मदन भैया  बहुतेरे समझाया दवाइयां लेना बंद मत करो वह नही मानी थी ।
        दिसम्बर का माह ,ठंड अपने चरम पर आ गया था। लोग गरम कपड़े पहनकर भी काँपने लगें थे। उस ठंडे माहौल से भरे एक रात सुशीला भाभी की व्याधि भयंकर हो गया । वह रोने ,चिल्लाने लगी । वह कह रही थी मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है ,जो मेरे शरीर से खून चूस रहे हो ?आखिर क्यों इतना दर्द दे रहे हो? वह पागलों की तरह मदन भैया से लिपटकर ओझा के पास ले जाने की जिद करने लगी। गला सुख चुका था , वह बेहोश हो गई। जब होश आया तो वह अपने को अस्पताल में पाई। ड्रीप चढ़ी है ,मरीजों की अलमारी बिस्तर से सटी है जिस पर दवाइयां बिखरी पड़ी है , तेल से मालिश भी किया गया है। शाम को डॉक्टर आए उन्होंने बताया कि ऑटो न मिलना , फिर पड़ोसी की मदद से मोटरसाइकिल पर अस्पताल लाना , रातभर मालिश करना जैसे परेशानीयों के साथ आपकी पति ने उनींदा में रात कांटा है। अब आप ठीक हैं, दो दिन में छुट्टी दे दी जाएगी, लगातार कुछ दिन दवाई खाते रहने से आराम मिलेगा। बीच- बीच मे आते रहना बीमारी नियंत्रित रहेगी। सुशीला के मन मे अपने अंधविश्वासी कृत्यों पर मलाल स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। वह मदन भैया की ओर सजल अपलक देख रही थी ,मदन भैया के चेहरे पर सुकून भरे मुस्कान था। बरसों बाद आज भी सुशीला भाभी कहती है विश्वासी होना अच्छी बात है पर अंधविश्वास ठीक नही।

            - - शैलेन्द्र चेलक - -

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