जिला - राजनादगांव
कविता
शीर्षक - दीवारों के भी कान होते है।
ना उदास ना निराश करो मन को, जिंदगी मिली है तो, जिंदादिली से जियो।
सब कहते हैं चांद सा मुखड़ा तेरा, ख्वाब बुना मैंने,सोचा सजते सवरते रहो।
मुंह की खानी पड़ती है अक्सर उन्हें,
अपने मुंह मियां मिट्ठू ना हमेशा बने रहो।
हर वक्त बजता रहा,कानों में युद्ध का बिगुल,
जाने कब कुच कर जाना हो तैयारी रखो।'
'मुंह में राम बगल में छुरी' इनसे रहिए सावधान,
'दीवारों के भी कान होते हैं', खुद को समझाते रहो।
तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बनती है,
जिंदा रहना है तो तकदीर को आजमाते रहो।
माधवी गणवीर
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