नाम- माधवी गणवीर
राज्य- छत्तीसगढ़
कविता- यही हूं मैं
राज्य- छत्तीसगढ़
कविता- यही हूं मैं
मन्दिर मस्जिद की तलाश में नही हूं मैं,
बस एक दिल हो ईमान का वही हूं मैं।
बस एक दिल हो ईमान का वही हूं मैं।
बेसुद न हो न मृग मरिचिका बन,
डायरी के चंद पन्नो में बसी हूं मैं।
डायरी के चंद पन्नो में बसी हूं मैं।
मायूस हो के लौट गया वो दरख़्त- खा से,
उसे पता नही गुमी हुई वो, हसीं हूं मैं।
उसे पता नही गुमी हुई वो, हसीं हूं मैं।
तलाश उसकी भी सही है जो गुमा हो,
यादो के दरख़्त तो खोलो, यही हूं मैं।
यादो के दरख़्त तो खोलो, यही हूं मैं।
बेखबर, बेअदब सा वो ढूढता फिर" माधवी'
हर रंग, हर रूप हर जर्रे में कही न कही हूं मैं।
हर रंग, हर रूप हर जर्रे में कही न कही हूं मैं।
माधवी गणवीर

बेहतरीन
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